कुछ स्मृतियों में शेष हो तुम
ललित गद्य (Literary Prose) कुछ स्मृतियों में शेष हो तुम — अल्पना सिंह कुछ स्मृतियों में अभी तक शेष हो तुम, शायद इसलिए कि कभी मेरे लिए बहुत विशेष थे तुम। तुम मेरी खुशियों की कुंजी थे। तुम्हें देखते ही न जाने क्यों मन झूम उठता था, जैसे बसंती हवा के झोंके से फूलों के गुच्छे झूम उठते हैं। तुम्हें देखना, तुम्हें देखते रहना और फिर घंटों तुम्हारे बारे में बातें करते रहना मेरी आदत बन गई थी। सखियाँ कहती थीं, “तू तो बौराई गई है,” और मैं हँसकर उनकी बात टाल देती थी। सच ही तो कहती थीं वे—जैसे आम के पेड़ों पर मंजरियाँ आती हैं तो कोयल बौराने लगती है, वैसे ही तुम्हारे आने से मेरा मन भी जाने कैसी-कैसी धुन गाने लगता था। ऐसा नहीं था कि मुझे कपड़े पहनने का सलीका नहीं आता था, लेकिन तुम्हें देखते ही मेरी चुन्नी जाने कैसे धीरे-धीरे सरकती हुई जमीन को छूने लगती थी। मैं उसे सँभालने की कोशिश करती और तुम… बस देखते रहते। यह मेरा दोष नहीं था, यह सब तुम्हारी नज़र का दोष था। हाँ, तुम्हारी नज़र में कुछ तो खास था। तभी तो तुम्हें देखते ही मैं अपनी सुध-बुध खो देती थी। अम्मा कुछ कहती थीं और मैं कुछ और ही कर देती थी।...



















