“मेरी लेखन-यात्रा” एक आत्ममंथन…
“मेरी लेखन-यात्रा” एक आत्ममंथन… कभी-कभी पीछे मुड़कर देखती हूँ तो सोचती हूँ—आखिर मेरी लेखन-यात्रा शुरू कहाँ से हुई थी? क्या मैंने कभी तय किया था कि मुझे लिखना है? शायद नहीं। मैंने तो बस लिखना शुरू किया था… अपने लिए। जो बातें मन को अच्छी लगतीं, उन्हें सहेजने के लिए। जो बातें दिल को चुभ जातीं, उन्हें मन से बाहर निकालने के लिए। जो कुछ किसी से कह नहीं पाती, उसे कागज से कह देने के लिए। इन दिनों मेरा मन अपने ही लेखन का आत्ममंथन करने में लगा है। सोचती हूँ, मैंने कब, कैसे और क्यों लिखना शुरू किया था? पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है, मेरी लेखन-यात्रा किसी किताब के पहले पन्ने से नहीं, बल्कि मेरी उस छोटी-सी डायरी से शुरू हुई थी, जिसके पन्नों पर मैं चुपचाप अपने मन की दुनिया उतार दिया करती थी। मुझे याद है, छोटी-छोटी बातें जो अच्छी लगती थीं, या जो दिल को चुभ जाती थीं, उन्हें डायरी में लिख लेना मेरी आदत थी। खासकर तब, जब किसी की कोई बात दिल को चोट पहुँचा जाती। शायद उन भावनाओं को शब्दों में उतार देना ही मेरा अपना तरीका था उन्हें संभालने का। और इन सबके बीच मेरी एक खास आदत थी—अपनी डायरी को छिपाकर रख...















