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प्रेम

  **“तुम्हारे प्रेम को समझ पाना मेरे बस में कहाँ था… मैं तो बस उलझती रही तुम्हारे नैनों के पेंच में, उन्हें सुलझा पाना भी मेरे बस में कहाँ था… तुम हर बार हारते रहे, और मैं हर पल तुमसे जीतती रही… तुम अपनी हर हार पर भी मुस्कुराते रहे, और मैं सब कुछ जीतकर भी पीड़ा में ही डूबी रही… हर जीत के बाद भी, अपना सब कुछ बस तुम ही पर हारती रही… क्योंकि… सब कुछ हारकर जीत पाना मेरे बस में कहाँ था…”** #writeralpnasingh  #velentinesday  #velentinedayspecial  #lovelife  #loveislove

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