जब रोशनी चली गई,
जब रोशनी चली गई शहर में रहने वालों के लिए बिजली का चले जाना अब कोई बड़ी घटना नहीं रह गई थी। कुछ देर के लिए बिजली गई नहीं कि इन्वर्टर अपने आप चालू हो जाता था। मोबाइल की बैटरी कम हुई नहीं कि चार्जर हाथ में आ जाता था। इंटरनेट धीमा हुआ तो मोबाइल डेटा था। हमारी जिंदगी इतनी सुविधाओं की आदी हो चुकी थी कि कई बार हमें एहसास ही नहीं होता था कि हम इन सुविधाओं पर कितने निर्भर हो चुके हैं। मैं भी उन्हीं लोगों में से एक थी। मैंने जब से होश संभाला था, अपने आसपास बिजली, पंखे, टीवी, मोबाइल और दूसरी सुविधाओं को सहज रूप से मौजूद पाया था। मायका हो या ससुराल, कभी ऐसा नहीं लगा कि इन चीजों के बिना भी जिंदगी चल सकती है। सावन का महीना था। ससुराल के गाँव में पूजा रखी गई थी। जेठानी का फोन आया तो उन्होंने बड़े प्यार से गाँव आने के लिए कहा। पति शहर में नहीं रहते थे, इसलिए मैंने ड्राइवर के साथ गाँव जाने का फैसला कर लिया। गाँव पहुँची तो पूजा शुरू हो चुकी थी। मैं जल्दी से पूजा में जाकर बैठ गई। करीब दो घंटे तक पूजा चली। पूजा खत्म हुई तो घर की औरतों के साथ बैठकर बातें शुरू हो गईं। गाँव के घरों में समय जैसे थोड़ी ...














