नील-मणि (पार्ट 1)
नीलमणि पार्ट 1
आज से चार हजार साल पहले की बात है। द्वापर युग का अंत और कलयुग का आगमन हो रहा था। सभी देवी देवता धरती छोड़ कर जा रहे थे। और चिंतित भी थे। अब इस पृथ्वी का क्या होगा। सारे देवता धरती छोड़ कर जाने से पहले आपस में विचार-विमर्श कर भगवान शिव से मिलने कैलाश पर पहुंचे,
सभी देवता हाथ जोड़ कर भगवान शिव से बोले – हे भगवान इस पृथ्वी का क्या होगा। कलयुग ने तो आते ही अपना रंग दिखा दिया। राजा परीक्षित के साथ जो हुआ।वह आप से छुपा नहीं है। राजा परीक्षित सर्वश्रेठ कुल के पाण्डु के पौत्र थे। अत्यंत ज्ञानी, बुद्धिमान और बलशाली थे। इस कलयुग ने उनकी भी मति भ्रमित कर दिया। हे त्रिदेव आम मनुष्यों की क्या बिसात। देवताओं के वार्तालाप को सुनकर भगवान शंकर बोले – हे देवता गण आप तो जानते है समय परिवर्तन शील है। ये हमेशा बदलता रहता है इसलिए कलयुग का आगमन तो पहले से ही निश्चित था। परन्तु हे देवता गण आप लोग चिंतित ना हो। जबतक साधारण मनुष्यों का विश्वास मेरे ऊपर बना हुआ है ये कलयुग इनका कुछ नहीं कर पायेगा। समस्त पृथ्वी पर मेरे आत्म लिंग और ज्योतिर्लिंग है, ये इन साधारण मनुष्यों के विश्वास को टूटने नहीं देंगे । इस पृथ्वी पर एक भी मनुष्य के अंदर सत्य रहेगा तब तक उस सत्य के अंदर शिव रहेंगे अथार्त उस मनुष्य के अंदर मैं विद्यमान रहूँगा। मैं अपने कंधों पर समस्त पृथ्वी का भार उठाये रहूँगा। और जब तक मैं इस पृथ्वी पर विद्यमान रहूँगा। इस समस्त पृथ्वी पर कलयुग का पूर्ण साम्राज्य स्थापित नहीं हो पायेगा। इसलिए ये कलयुग इस पृथ्वी का विनाश नहीं कर पायेगा। आप सब निश्चिंत हो कर अपने लोक को जाये।इधर जब कलयुग ने ये सब सुना तो वह भी पहुंच गया। भगवान शिव के पास और हाथ जोड़ कर बोला – भगवान अपने मेरे साथ छल किया है। ये कैसा न्याय है प्रभु। पृथ्वी का राजा मुझे बना दिए और साम्राज्य देवताओं का रहेगा। ये मेरे साथ छल नहीं तो और क्या है भगवान। भगवान शंकर बोले – हे पुत्र तुम्हारी ही इच्छा थी की जब तुम पृथ्वी के राजा बनो तब ये सारे देवी देवता धरती छोड़ कर अपने लोक को चले जाये। परन्तु ये भी पूर्ण सत्य है की यहां हर मनुष्य के अंदर देवताओं का वाश है। इसलिए हे पुत्र जब तक सारे मनुष्यों के अंदर से देवत्व का गुण समाप्त नहीं हो जाता तब तक इस पृथ्वी पर तुम्हारा साम्राज्य पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हो पायेगा। इसलिए हे पुत्र तुम्हारी लड़ाई पृथ्वी के हर साधारण मनुष्य से है। मैंने तुम्हारे साथ कोई छल नहीं किया और ना ही मैंने देवताओं को कोई वरदान नहीं दिया है। मैंने तो केवल सत्य से परिचय कराया है।कलयुग आश्चर्य से – इन साधारण मनुष्यों से मेरी लड़ाई है जो निर्बल है कमजोर है जो बात - बात में अपनी सहायता के लिए देवताओं पर निर्भर है। हे देवों के देव महादेव कही आप मेरा परिहास तो नहीं कर रहे है। नहीं पुत्र मैं तुम्हारा परिहास नहीं कर रहा हुँ। मैं तो तुम्हें केवल सत्य से अवगत करा रहा हुँ और यही सत्य है। किन्तु पुत्र अपने शत्रु को कमजोर समझना एक राजा को शोभा नहीं देता। पुत्र तुम्हारी ही इच्छा थी की जब तुम पृथ्वी के राजा बनो तब सारे देवी देवता पृथ्वी छोड़ कर चले जाये। क्यों की तुम्हारा ये भ्रम है की जब तक इस पृथ्वी पर ये देवी देवता रहेंगे तब तक इस पृथ्वी पर तुम्हारा राज्य स्थापित नहीं हो पायेगा। तो सुनो पुत्र यहां हर मनुष्य के अंदर मैं विद्यमान हुँ। हर मनुष्य के अंदर देवत्व का गुण विद्यमान है। जब तक सारे मनुष्य के अंदर से ये देवत्व का गुण समाप्त नहीं हो जाता तब तक इस पूरी पृथ्वी पर पूर्ण रूप से तुम्हारा साम्राज्य स्थापित नहीं हो पायेगा। इसलिए हे कलयुग तुम्हारी लड़ाई हर मनुष्य से है। कलयुग और महादेव की वार्तालाप को सुनकर माँ पार्वती से रहा नहीं गया। महादेव से बोली – हे स्वामी, हे देवों के देव महादेव आपने इस कलयुग का तो अपने शत्रु से परिचय करा दिया। परन्तु हे स्वामी अब मुझे इन मनुष्यों की चिंता होने लगी है। इन मनुष्यों को इस कलयुग से कौन परिचय कराएगा। कौन इनकी सहायता करेगा, कौन इन्हें सही रास्ता दिखायेगा प्रभु। भगवान भोले नाथ बोले- गुरु। गुरु ही इस घोर कलयुग में मनुष्यों की सहायता करेंगे, गुरु ही इन्हें सत्य से अवगत कराएंगे। गुरु ही इन मनुष्यों को अज्ञानता के इस कलयुग से ज्ञान के प्रकाश से बचा सकते है। हे स्वामी इस कलयुग में इन साधारण मनुष्यों में एक गुरु श्रेष्ठ का उदाहरण बताये प्रभु। क्या वास्तव में मनुष्यों के अंदर से देवत्व का गुण समाप्त करना इस कलयुग के लिए असंभव है।
भगवान शिव पृथ्वी की ओर इशारा करते हुए बोले – हे देवी उज्जैन नगरी में शिप्रा नदी के किनारे शिवानंद नाम का एक ब्राह्मण अपनी बैध पत्नी और आठ पुत्रों के साथ निवास करते है यदि ये कलयुग इनके और इनके परिवार को पथ भ्रस्ट कर देगा तो समझ लेना इस समस्त पृथ्वी पर कलयुग का साम्राज्य स्थापित हो जायेगा। अन्यथा नहीं। स्वामी इस ब्राह्मण में क्या विशिष्टता है। हे देवी – यह ब्राह्मण मेरा भक्त है। इसने अपने आठों पुत्र का नाम मेरे नाम पर रखा है जिस कारण इस ब्राह्मण के जीहवा पर प्रत्येक क्षण मेरा ही नाम रहता है। इस ब्राह्मण को बिना इसके इच्छा के इस धरती से कोई नहीं ले जा सकता है। थोड़ी दूरी पर खड़ा कलयुग ये सारी बाते सुन रहा था। ये सुन कलयुग चल पड़ा महाकाल के नगर उज्जैन।
इधर एक नाग नागिन का जोड़ा तपस्या में लीन था। उन्हें तो पता भी नहीं था की कलयुग का आगमन हो चूका है। उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले – वत्स आँखें खोलो, मैं तुम दोनों की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुँ। मांगो वत्स तुम्हें क्या चाहिए। नाग -नागिन दोनों हाथ जोड़ कर बोले- प्रभु, जिनको आपके दर्शन हो जाये उन्हें और क्या चाहिए प्रभु, आप हमें अपने शरण में ले लीजिये, हमें मुक्ति दे दीजिये प्रभु।
भगवान शंकर बोले – वत्स तुम दोनों का जीवन पृथ्वी पर अभी शेष है। इसलिए तुम दोनों अभी पृथ्वी पर जाओ और अपना जीवन व्यतीत करो। समय आने पर तुम दोनों को मुक्ति अवश्य मिलेगी।
नाग नागिन बोले जैसी प्रभु की इच्छा, नाग नागिन अपनी मणि भगवान शिव को देते हुए बोले – भगवान हम ये आपको समर्पित करना चाहते है इस मणि को आप स्वीकार करें प्रभु। भगवान शिव मणि को अपने हाथों में लेते है, और वापस से उस मणि को नाग नागिन को देते हुए बोलते है – वत्स तुम्हारी इच्छा अनुसार मैंने ये मणि स्वीकार की। अब ये मणि तुम दोनों धरती पर जा कर उज्जैन के राजकुमार जो मेरा ही पुत्र है उसे मेरे आशीर्वाद के रूप में दे देना। परन्तु सावधान वत्स, अब ये मणि पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो गया है, ये किसी गलत इंसान के हाथों में नहीं पड़नी चाहिए। अब ये तुम दोनों की जिम्मेदारी है। इस मणि की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब तुम दोनों की है। जैसी आपकी इच्छा। दोनों ने भगवान शंकर को प्रणाम किया और पृथ्वी की ओर चल दिए। दोनों एक जंगल में पहुंच कर एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे। नागिन- नाग से बोली – हे स्वामी भगवान शिव शंकर तो देवों के देव है, उन्होंने इस मणि को अपने हाथों में ले लिया इसी से इस मणि का महत्व बढ़ गया स्वामी, वे स्वयं भी इस मणि को उस राजकुमार को दे सकते थे परन्तु उन्होंने हमें इसे देने के लिए क्यों कहा स्वामी । ये बात मेरी समझ में नहीं आयी । नाग बोला – हे प्रिय उनकी लीला वही जाने अपने इष्ट देव की आज्ञा का पालन करना हमारा परम कर्तव्य है। इसलिए इस मणि को राजकुमार तक अति शीघ्र पहुंचाना है। वही पेड़ के पीछे कलयुग बैठा उन दोनों नाग नागिन की बाते सुन रहा था। वह उस नाग नागिन के सामने प्रकट हो गया। और उनसे मणि मांगी, नाग नागिन ने मणि देने से इनकार कर दिया । तब वह उनसे बलपूर्वक मणि छीनने का प्रयास करने लगा। नाग नागिन दोनों अपने प्राण बचा कर वहाँ से भागे। भागते- भागते वह एक छोटे से घर में घुस गए। वह घर एक ब्राह्मण का था। उस ब्राह्मण का नाम शिवानंद था। नागिन ने नाग से पूछा ये दुष्ट कौन है स्वामी जो हमारे जान के पीछे पड़ा है। नाग बोला – युग परिवर्तन हो चूका है प्रिय द्वापर युग का अंत हो गया है कलजुग आरम्भ हो चूका है। ये इस काल का राजा कलयुग है जो हमसे ये मणि छीन कर इस पृथ्वी पर से देवत्व का प्रभाव कम करना चाहता है। ब्राह्मण देव उस समय नदी पर स्नान करने जा रहे थे। कलयुग ने देखा ये वही ब्राह्मण है जिसके बारे में भगवान शंकर माँ पार्वती को बता रहे थे। कलयुग ने तुरंत एक छल युक्त योजना बना डाली। वह एक सपेरा का रूप ले लिया। और ब्राह्मण के घर के द्वार पर पहुंच गया। और ब्राह्मण से बोला तुम्हारे कुटिया में दो विषैले सर्प घुस आये है। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं उसे निकाल दूँ।
ब्राह्मण देव बोले – देखिये सपेरे महाराज ये सर्प मन पवन प्राणी होते है। आज यहां कल कही और चले जायेंगे। आप व्यर्थ में इनकी चिंता नहीं करें, ये अपने आप ही कही चले जायेंगे। सपेरा बोला – देखिये ब्राह्मण देव आपकी कुटिया में आपकी पत्नी, आपके आठ पुत्रों के अलावा बहुत सारे रोगी उपचार हेतु आते है। यदि इस विषैले सर्प ने किसी को काट लिया तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिए हे ब्राह्मण देव आप मुझे आज्ञा दे की मैं इन विषैले सर्प को पकड़ कर दूर जंगल में छोड़ आऊँ। और यदि इन साँपों पर किसी और की नजर पड़ गयी तो वह अकारण ही इनकी हत्या कर देगा । इसलिए हे ब्राह्मण देव आप मुझे आज्ञा दे की मैं इन साँपों को पकड़ कर किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ आऊँ।
इतना सुन कर
ब्राह्मण देव सोच में पड़ गए। वे अंदर जा कर अपनी पत्नी को आवाज लगाने लगे। तभी नाग
नागिन के उस जोड़े ने ब्राह्मण देव के पैरो पर गिर कर अपने प्राण बचाने के लिए
प्रार्थना करने लगे। वे बोले – हे ब्राह्मण देव
हमारी रक्षा कीजिये। हम आपके शरण में आये है। ये कोई साधारण सपेरा नहीं है। ये कली
है, वास्तव में ये इस युग का
राजा कलयुग है, परन्तु ये बहुत
दुष्ट है। इस काल में मनुष्य के अंदर से सकारात्मक भाव का नाश और नकारात्मक भाव का
उद्भव होगा। ये इस युग में धरती से देवत्व गुण का नाश कर देना चाहता है।
हे ब्राह्मण देव हम दोनों ने कठिन तपस्या कर ये मणि प्राप्त की हैं और ये दुष्ट अघोरी इसे छीन लेना चाहता हैं। हे विप्र इस मणि के बिना हम जीवित नहीं रह पाएंगे। हे ब्राह्मण देव हमारी रक्षा कीजिये हम आपकी शरण में आये हैं शरणागत की रक्षा करना आपका धर्म हैं।
ये सब सुन कर ब्राह्मण देव सोच में पड़ गये। ब्राह्मण देव सोचने लगे शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म ही नहीं मेरा परम कर्त्तव्य भी हैं। चाहे वह कोई भी हो। इतना सोचते हुए ब्राह्मण देव बाहर आये और अघोरी तांत्रिक से बोले - सुन सपेरे, ये नाग नागिन का जोड़ा अब मेरे शरण में हैं। और अब मेरे अतिथि भी हैं इनकी रक्षा करना मेरा धर्म ही नहीं अपितु मेरा कर्तव्य भी हैं। इतना सुन सपेरे को गुस्सा आ गया। वह अपने असली रूप में आ गया और गुस्से से बोला -ये मूर्ख पंडित मैं तुमसे शिष्टता से बात कर रहा हुँ और तुम मुझसे धर्म अधर्म की बात कर रहे हो मैं इस युग का राजा कलयुग हुँ। मैं तुझे आज्ञा देता हुँ, मुझे अपने घर में प्रवेश करने दो ताकि मैं इन नाग– नागिन के जोड़े को पकड़ सकूँ, यदि तुमने मुझे ऐसा नहीं करने दिया तो मैं तुम्हें दंड दूंगा। इतना सुन कर ब्राह्मण देव ने उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम किया, और बोले आप जो कोई भी हो शरण में आये शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म हैं, और जब तक मैं जीवित हुँ तब कर इनकी रक्षा करूँगा। इतना सुन कर सपेरा आग बबूला हो गया और गुस्से से बोला -अरे मूर्ख पंडित क्यों अकारण ही अपनी मृत्यु को आमंत्रण दे रहा हैं हट जा मेरे रास्ते से, मैं तुझसे युद्ध नहीं करना चाहता हुँ। लेकिन ब्राह्मण देव नहीं माने, ब्राह्मण और कलयुग में मल युद्ध आरम्भ हो गया। कलयुग ब्राह्मण देव को आकाश में उड़ा ले गया। तीन दिन तीन रातों तक युद्ध चला ब्राह्मण देव ने कलयुग को अपने बाजुओं में कस के जकड़ लिया कलयुग बहुत छूटने का प्रयास कर रहा था परन्तु छूट नहीं पाया, वह मन ही मन शिव को याद करने लगा। तभी ब्राह्मण देव ने कलयुग को जोर से धरती पर पटक दिया, और बोले -सुन पाखंडी सपेरे जब तक ये नाग – नागिन के जोड़े मेरी शरण में है तब तक तू इनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। इसलिए तू यहां से चला जा। इतना बोल कर ब्राह्मण देव स्नान करने चले गए । कलयुग समझ गया की ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं। ये अत्यंत ज्ञानी हैं और इसमें लोभ और ईर्ष्या लेस मात्र भी नहीं हैं, इसे पराजित करना अत्यंत कठिन होगा, मन ही मन कलयुग सोचा इस ब्राह्मण को पराजित करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इसके बाद सपेरा बना कलयुग गाँव के बाहर एक बरगद का पेड़ था. वही अपनी कुटिया बना कर रहने लगा.।
ऐसे ही कुछ दिन बीत गए। एक दिन वह ब्राह्मण और उनकी पत्नी निरुपमा अपने कुटिया के आँगन में बैठे थे, ब्राह्मण देव अपनी पत्नी को प्रेम से देख रहे थे., निरुपमा भी अपने पति को देख कर मंद -मंद मुसकुरा रही थी। ब्राह्मण देव अपनी पत्नी निरुपमा से बोले -प्रिय आज की शाम अत्यंत मनोरम हैं। चारों तरफ का ये मनोरम दृश्य मन को अत्यंत प्रिय लग रहा हैं। इतना सुन कर निरुपमा अपने पति के पास आ कर बैठ गयी। ब्राह्मण देव ने अपनी पत्नी निरुपमा के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोले -प्रिय आज तुम भी अत्यंत रूपसी लग रही हो किसी स्वर्ग की अप्सरा जैसी। इतना बोल कर ब्राह्मण देव ने निरुपमा को अपने आलिंगन में भर लिया। और बड़े प्रेम से निरुपमा के माथे को चूम लिया। निरुपमा की आँखें लज्जा से झुक गयी और वह आलिंगन से छूटते हुए लज्जा से बोली – आठ पुत्रों के पिता हैं आप, आपको ऐसी बाते शोभा नहीं देती, ब्राह्मण देव हँसते हुए कहते हैं -प्रिय आठ पुत्र हैं एक पुत्री नहीं हैं। मेरी इच्छा है की हमारी एक पुत्री हो । हे प्रिय पुत्री के बिना आँगन सुना-सुना हैं। इसलिए मेरी इच्छा हैँ की हमारे घर एक पुत्री का जन्म हो। इतना बोलकर ब्राह्मण देव निरुपमा को लेकर कुटिया के अंदर चले गए। कुछ समय पश्चात निरुपमा गर्भ से थी। इधर सपेरा बना कलयुग गाँव के बाहर डेरा जमा कर बैठ गया। वह उन दोनों नाग – नागिन के जोड़ो की प्रतीक्षा करने लगा।
समय बीतता गया, वर्षा ऋतु का आगमन हो गया था ।एक दिवस घर पर कोई नहीं था, ब्राह्मण स्त्री को प्रसव पीड़ा होने लगी। बहुत जोड़ो से वर्षा हो रही थी, निरुपमा प्रसव पीड़ा से छटपटाने लगी। और दर्द से मूर्छित , हो गयी। थोड़ी देर बाद जब ब्राह्मण देव घर पर आये तो उन्होंने देखा निरुपमा मूर्छित है, और एक प्यारी सी बच्ची वही किलकारी मार रही हैं। ब्राह्मण देव दौड़ कर गए और दायी को बुला कर ले आये, उसने बच्ची और निरुपमा को देखा और बोली सब ठीक हैं माँ और बच्ची दोनों स्वस्थ है। बधाई हो पंडित जी आपको लड़की हुई हैं। ब्राह्मण देव बहुत खुश होते हैं और बच्ची को गोद में ले लेते हैं। और दायी को परितोष देते हैं दायी ख़ुशी - ख़ुशी वहाँ से चली जाती हैं ब्राह्मण देव बहुत खुश हैं। आठ पुत्रों के बाद उन्हें एक पुत्री हुई। वह बच्ची को निरुपमा के गोद में देते हैं। निरुपमा भी पुत्री के आने से बहुत खुश
थी। वह भी बड़े प्यार से पुत्री को निहार रही थी।
आठ पुत्रों के पश्चात ब्राह्मण देव को पुत्री हुई थी, इसलिए ब्राह्मण देव, उनकी पत्नी और आठों पुत्र बहुत प्रसन्न थे। चारों तरफ
प्रसन्नता का वातावरण था। पुत्री के जन्म पर ब्राह्मण देव ने पूरे गाँव को भोजन पर
बुलाया था। सारे गाँव वाले पुत्री के लिए उपहार ले कर आये थे। भोजन के उपरांत सारे
गाँव वाले को विदा कर ब्राह्मण देव थक गए थे। बहुत रात हो गयी थी, ब्राह्मण देव थक कर आँगन में ही खाट पर सो गए।
आधी रात के समय नाग नागिन के जोड़े वहाँ आये और ब्राह्मण देव को प्रणाम करते हैं।
ब्राह्मण देव उठ कर बैठ जाते हैं। नाग नागिन ने ब्राह्मण देव को पुत्री के जन्म की
बधाई दी। और ब्राह्मण देव से बोले -हे
ब्राह्मण देव बहुत दिन हो गए अब हम अपने लोक को प्रस्थान करेंगे, हमारे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है बस
ये मणि हैं जो हम आपकी पुत्री को उपहार स्वरूप प्रदान कर रहे है , इसे स्वीकार कीजिये ब्राह्मण देव। और हमें
आज्ञा दीजिये ताकि हम नागलोक प्रस्थान कर सके। ब्राह्मण देव नाग नागिन से बोले -वह
दुष्ट सपेरा गाँव के बाहर आप दोनों की प्रतीक्षा में बैठा हैं संकट अभी तला नहीं
हैं। नाग देव बोले -हे ब्राह्मण देव हम अपनी मृत्यु के भय से कब तक यहां छुपे
रहेंगे, हमें वापस अपने घर तो
जाना ही होगा। इसलिए हमें आज्ञा दे हम अपने घर को जायेंगे। ब्राह्मण देव बोले
-जैसी आप दोनों की इच्छा, मैं आप दोनों को
जंगल में छोड़ देता हुँ। ब्राह्मण देव घर के अंदर गए और एक झोला ले कर आये, नाग नागिन को झोले में डाल कर जंगल की ओर चल
दिए। ब्राह्मण देव नाग नागिन को जंगल के बीच छोड़
कर वापस लौट आये। और अपने परिवार के साथ आराम से रहने लगते है। ऐसे ही कुछ
महीने बीत गए। ब्राह्मण देव ने अपनी पुत्री का नाम मणि रखा। मणि बहुत प्यारी बच्ची
थी। सभी मणि को बहुत प्यार करते थे आठों भाई भी मणि को बहुत प्यार करते थे। इसी
तरह प्रेम पूर्वक दिन कट रहे थे। मणि दो महीने की हो गयी। एक दिन की घटना हैं ।
दोपहर का समय था, मणि सो रही थी।
निरुपमा अपने काम में व्यस्त थी , बड़े भाई बाहर गए
थे ओर शेष खेल रहे थे। चुकी ब्राह्मण देव आचार्य थे, वे गुरुकुल गए थे। तभी ब्राह्मण देव का छोटा लड़का माँ से
आकर पूछता है -माँ, माँ,...........
मणि कहा है, माँ कहती है कमरे में सो रही है। लड़का दौड़ कर कमरे में जाता
है। वहाँ का दृश्य देख कर उसके होश उड़ जाते है, माँ, माँ चिल्लाता हुआ
वह वापस आता हैं, माँ मणि, मणि, बस इतना ही बोल निकलता है उसके मुँह से, माँ पूछती है क्या हुआ मणि को, लड़के के मुँह से बोल नहीं निकल पाता है। वह केवल उंगली से
मणि के तरफ इशारा करता है। माँ दौड़ कर मणि के कमरे की और भागती हैं । वहाँ का
दृश्य देख कर माँ के होश उड़ जाते है। एक काला भयंकर सर्प चारों तरफ से मणि को घेर
कर फन फैलाकर बैठा था। निरुपमा कुछ कर पाती इससे पहले शोर सुन कर गाँव वाले चले
आते है। सर्प शोर सुन कर भाग जाता हैं। निरुपमा दौड़ कर मणि को गोद में उठा लेती है
और उसे सीने से लगा कर चूमने लगती है। इधर उधर देखने लगती है कही सर्प ने उसे काटा
तो नहीं। आश्चर्य, मणि को कुछ नहीं
हुआ था मणि बिलकुल ठीक थी। मणि इस कोलाहल
से रोने लगाती है। निरुपमा उसे चुप कराने लगती है। शाम को जब पंडित जी घर आते हैं
तब निरुपमा उन्हें सारी बात बताती हैँ। पंडित जी प्यार से मणि को गोद में उठा लेते
हैं। और सोच में पड़ जाते हैं। पंडित जी सोच रहे है की नाग नागिन के जोड़े को तो
मैंने जंगल में छोड़ दिया था।, ये वही नाग नागिन
हैं या कोई और सर्प मेरी बच्ची के आस – पास फटक रहा हैं। इसी उधेडबुन में पंडित जी को रात भर नींद नहीं आयी। सुबह जब
वह नदी पर पहुँचे तब भी वह सोच ही रहे थे तभी पंडित जी को पीछे से कोई आवाज़ देता
हैं। पंडित जी पीछे मुड़ कर देखते हैं तो ये वही सपेरा था। वह पंडित जी को देख कर
जोर-जोर से हंसने लगा। और व्यंग से बोला – क्या बात हैं पंडित जी बहुत चिंतित लग रहे हैं , घर में सब कुशल मंगल तो हैं ना,पंडित जी का ध्यान भंग हो जाता हैं। वे गुस्से से उस सपेरे
को देखते हैं और वे बोलते हैं -तो ये सब तेरी चाल है दुष्ट सपेरे , सपेरा बोला -ये मूर्ख पंडित ये सब तेरी अच्छाई
का फल हैं। इस धरती पर सभी जीव जंतु को अपनी जान से ज्यादा अपनी औलाद की जान
प्यारी हैं वे अपने बच्चे की जान बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता हैं।
पंडित जी बोले
-अथार्त तुम्हारे कहने का अभिप्राय क्या हैं दुष्ट, साफ-साफ बता। सपेरा हँसते हुए बोला अथार्त, अरे मूर्ख पंडित तू जिसे अपनी पुत्री समझ रहा हैं
वास्तव में तेरी पुत्री हैं ही नहीं, वह एक नागिन हैं। उस नाग नागिन की पुत्री, मणि के प्रभाव से उस नाग नागिन के जोड़े ने अपने बच्चे को
लड़की बना कर तुम्हारी पत्नी के गोद में रख दिया। और बड़े ही चालाकी से तुझे मूर्ख
बना कर यहां से चले गए। सपेरा चीखता हुआ बोला जो तेरी पत्नी की गोद में जो बच्ची
है वह एक नागिन है नागिन । पंडित जी शून्य खड़े थे, पंडित जी गुस्से से बोले झूठ हैं ये सब, धूर्त, पाखंडी, तू झूठ बोल रहा
हैं । सपेरा बोला – तेरी मर्जी तुझे
मानना हैं तो मान,नहीं मानना हैं
तो नहीं मान, तुझे सत्य से
अवगत कराना मेरा कर्तव्य था. आगे तेरी मर्जी। इतना बोल कर सपेरा वहाँ से चला गया।
और पंडित जी सोचने लगे। शुरू से सारी घटना याद करने लगे, जब वे घर पहुँचे तब निरुपमा मूर्छित अवस्था में थी। बच्ची
वही किलकारी मार रही थी। घर पर कोई नहीं था। पंडित जी सोच रहे थे अगर ये उस नाग
नागिन की बच्ची हैं तो मेरी बच्ची कहा है,?
नमस्ते ,
दोस्तों आज मैं अपनी दूसरी कहानी नील मणि की श्रृंखला शुरू करने जा रही हूँ,इसे पढ़ कर कमेंट में जरुर बताये की मेरी कहानी कैसी लगी, और आगे की कहानी के लिए जुड़े रहिये मेरे ब्लॉग https://www.mystoriess.com/ से
Bhut achi khani hai !!!! Waiting for next part
ReplyDeleteFantastic story
ReplyDeleteVerry nice
ReplyDeleteCan't wait for the second part
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