नील-मणि (पार्ट 2 )
नीलमणि के पहले पार्ट में आपने पढ़ा की कैसे कलजुग ने पंडित शिवानन्द को भ्रमित कर दिया, जो बच्ची उनके पास हैं ओ बच्ची उनकी है भी या नहीं, और अपनी बच्ची के लिए पंडित शिवानन्द के दिमाग में तरह-तरह विचार आने लगते हैं, और इन्ही विचारों में खोये पंडित जी धीरे-धीरे चलते हुए अपने घर आते हैं आगे-
ये तो वे नाग जोड़े ही बता सकते हैं। फिर मन ही मन बोलते हैं नहीं नहीं ये सत्य नहीं हैं ये मेरी बच्ची हैं,नागिन नहीं है। ये धूर्त सपेरा मुझे भ्रमित कर रहा हैं। यही सोचते-सोचते पंडित जी धीरे-धीरे चलते हुए घर आते हैं। परन्तु सपेरे की बात पंडित जी के दिमाग़ में घर कर गयी थी। जब भी वो मणि को देखते सपेरे की बात याद आ जाती थी, मणि उन्हें नागिन दिखाई देती । सुबह शाम पंडित जी को अपनी पत्नी और बेटों की चिंता सताने लगी। जिस पुत्री को पंडित जी बहुत प्रेम करते थे उसी पुत्री से डरने लगे।
एक रात्रि जब उनकी पत्नी और बेटे गहरी नींद में सो रहे थे तब पंडित जी ने मणि को गोद में उठाया और जंगल की ओर चल दिए । चलते-चलते पंडित जी बार-बार मणि के मुखड़े को देख रहे थे। मणि गहरी नींद में सो रही थी। नींद में मणि मुसकुरा रही थी। मुसकुराते हुए मणि बहुत प्यारी और मासूम लग रही थी। चलते-चलते पंडित जी जंगल के बीच पहुंच जाते हैं। सुबह होने वाली थी। तभी वहाँ पंडित जी को एक चबूतरा दिखाई देता हैं। वे वहाँ बैठ कर सुस्ताने लगते हैं। उन्होंने देखा चबूतरे पर सूखे पते बिखरे हुए हैं एक हाथ से उन्होंने पते को हटाया तो देखा वहाँ एक शिवलिंग है। पंडित जी ने चबूतरे पर मणि को सुला दिया और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान शिव को प्रणाम किया उनके आँखों से अश्रु की धारा बह रही थी। तभी मणि रोने लगती हैं। पंडित जी दौड़ कर मणि को उठा लेते हैं। और अपने सीने से लगा कर माथे को चूम लेते हैं। पंडित जी इधर उधर घूम-घूम कर मणि को चुप कराने लगते हैं। तभी उन्हें एक आवाज सुनाई देती हैं। पंडित जी ने सर उठा कर सामने की ओर देखा। सामने एक आदमी और एक औरत खड़े थे। वह औरत बोली महा पंडित बच्ची को भूख लगी होंगी, एक कटोरे में दूध देते हुए बोली लो इसे पीला दो। पंडित जी असमंजस में पड़ गए वे मन ही मन सोच रहे थे इस घने जंगल में ये दोनों कौन है,और इनके पास ये दूध कहा से आया । आस-पास दूर-दूर तक कोई आबादी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी वह आदमी बोल पड़ा - ब्राह्मण देव आप तो इस बच्ची को इस घने जंगल में छोड़ने आये है फिर इस बच्ची से मोह कैसा। हम दोनों आप ही की प्रतीक्षा कर रहे थे। पंडित जी इतना सुन कर चौक जाते हैं और हाथ जोड़ कर उनसे पूछते हैं, हे भले मानस आप दोनों कौन हैं आप मेरी प्रतीक्षा क्यों कर रहे कृपया अपना परिचय दे।
आदमी बोला – हे ब्राह्मण देव कृपया पहले आप अपनी बच्ची को मेरी पत्नी को दे दे, ताकि वह इस बच्ची को दूध पीला सके। क्यों की आपकी बच्ची बहुत भूखी हैँ।
पंडित जी ने मणि को उस औरत को दे दिया। उनके आँखों से अश्रु की धारा भी रही थी।
वह आदमी मुस्कुरात्ते हुए बोला – आपको सत्य बताने के लिए ही हमदोनो यहां आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे, हमें पूर्ण विश्वास था की आप यहां अवश्य आएंगे।
पंडित जी उन दोनों को आश्चर्य से देखते हैं।
फिर उस आदमी और उस औरत ने अपना असली रूप उन्हें दिखाया। पंडित जी आश्चर्य से देखते रह जाते हैं, ये वही नाग नागिन के जोड़े थे।
तब वह नाग बोलता हैं – हे ब्राह्मण देव आपके साथ छल हुआ हैं। और ये छल मैंने नहीं उस अघोरी ने किया हैं। हे ब्राह्मण देव ये मणि आप ही की पुत्री हैं परन्तु, इतना बोल कर नाग चुप हो जाता हैं।
ब्राह्मण देव बोलते हैं परन्तु नाग देव आप चुप क्यों हो गए, क्या हुआ है कृपया मुझे बताइए।
नाग बोला – हे ब्राह्मण देव एक दिवस जब आप और आपके पुत्र घर पर उपस्थित नहीं थे, वह अघोरी घर में घुस आया था। परन्तु आपकी पत्नी भी आपकी तरह वीर और दयालु हैं। नाव महीने गर्भ से होने के बाद भी वह आपके वचन और हमारे प्राणों की रक्षा हेतु उस अघोरी से लड़ पड़ी। और उन्होंने उस अघोरी को हरा दिया. मजबूरन उस अघोरी को वहाँ से भागना पड़ा। परन्तु हे ब्राह्मण देव अत्यंत वर्षा और घायल होने के वजह से आपकी पत्नी पेट के तरफ से ही आँगन में गिर पड़ी, और मूर्छित हो गयी। उसी अवस्था में आपकी पत्नी ने एक कन्या को जन्म दिया । परन्तु इतना बोल कर नाग चुप हो गया । थोड़ी देर बाद नाग बोला - परन्तु वह कन्या मृत थी। आपकी पत्नी मूर्छित अवस्था में थी।
कन्या को मृत देख नाग और नागिन दोनों विलाप करने लगे.।
नागिन बोली हे देवों के देव महादेव ये कैसा न्याय हैं आपका, हे शिव शम्भू हम तुच्छ प्राणी की रक्षा, अपने धर्म और कर्त्तव्य हेतु इन दोनों पति पत्नी ने अपने प्राणों की परवाह नहीं की, उनके साथ ये कैसा न्याय है प्रभु, हम तो अपने प्राण भी नहीं त्याग सकते। हे। और ना ही हम जीवित रह सकते हैँ । जिनके प्राणों के रक्षा के लिए इन दोनों पति पत्नी ने अपना सब कुछ नौछावर कर दिया। उन्हें मृत देख कर इन पति पत्नी को बहुत दुख होगा। इतना बोल कर वे दोनों नाग नागिन वही विलाप करते हुए आँगन में लौटने लगे। तभी नाग का मणि वहाँ गिर जाता। चारों तरफ दिव्य अलौकिक रोशनी फ़ैल जाता हैं। दोनों चुप हो कर मणि को देखने लगते हैं। दोनों हाथ जोड़ कर भगवान शिव को प्रणाम कर उस मणि की शक्ति से उस कन्या को जीवित करने लगते हैं। तभी एक आवाज सुनाई पड़ती है, सावधान नागराज इस बच्ची की मृत्यु हो चुकी है, और इसे जीवित करना प्रकृति के नियम के विरुद्ध होगा, इस मणि की सारी शक्ति क्षीण हो जाएगी तुम दोनों की सारी तपस्या विफल हो जाएगी यहां तक की तुम दोनों के प्राण भी जा सकते है। इस लिए इस कन्या को जीवित करने का विचार त्याग दो वत्स। नाग नागिन ने हाथ जोड़ कर कहा – हे देव आप जो कोई भी हैँ मेरी बात सुने, ना तो हमें अपने प्राणों का मोह हैँ और नहीं इस मणि की शक्ति का। हमारे प्राण ले लीजिये, हमारी तपस्या से प्राप्त इस मणि की सारी शक्ति ले लीजिये, परन्तु इस कन्या को जीवन दान दे दीजिये प्रभु। तभी भगवान शिव वहाँ प्रकट होते हैं और उस नाग नागिन से कहते – जैसी तुम दोनों की इच्छा, मैं तुम दोनों की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुँ, तुम दोनों के नाग चुप हो गया, नागिन बोली ये भी सत्य हैं ब्राह्मण देव की इस मणि की शक्ति भी क्षीण हो गयी हैं। अब ये केवल एक चमकता पत्थर मात्र हैं। भगवान शिव की कठिन तपस्या के बाद हमें ये मणि प्राप्त हुई थी और भगवान शिव की इच्छा थी, धरती छोड़ने से पहले हमदोनो ये मणि उज्जैन के राजकुमार नील को दे, जो भगवान शिव की कृपा से इस धरती पर जन्म लिया है। परन्तु हे ब्राह्मण देव हम अपने इष्ट देव की इच्छा पूरी करने में असफल रहे। हे ब्राह्मण देव यदि आप इस कन्या को अपनी पुत्री नहीं मानते हैं तो कोई बात नहीं, इसे आप हमारी पुत्री समझ कर ही पालन कीजिये और सोलह वर्ष की होने पर इसका विवाह राजकुमार नील से करवा दीजिये गा। इससे हमारी आत्मा को शांति मिलेगी। हम समझेंगे हमने अपने इष्ट देव की आज्ञा का पालन कर दिया, हमें ऐसा वचन दीजिये देव। ब्राह्मण देव ने दोनों हाथ जोड़ कर उन दोनों से क्षमा मांगी, और उन्हें वचन दिया की जब उनकी पुत्री बड़ी हो जाएगी तब उसका विवाह राजकुमार नील से कराएंगे। ब्राह्मण देव ने कहा – मेरे मन में एक प्रश्न हैं?
नाग देव बोले – पूछिये क्या प्रश्न हैँ आपके मन में ब्राह्मण देव।
ब्राह्मण देव बोले – हे नाग देव एक काला सर्प मेरी बच्ची के आस पास घूम रहा है, वह कौन हैं।
नाग देव बोले – हे ब्राह्मण देव इस विषय में मैं ज्यादा नहीं जनता हुँ, परन्तु जितना जनता हुँ उतना बताता हुँ। वह नागेश है, उस सपरें ने उसे पकड़ रखा है। इस लिए आप सतर्क रहिएगा। इतना बोल कर नाग नागिन की आत्मा वहाँ से अंतरध्यान हो गए। पंडित जी अपनी बच्ची की सच्चाई जान गए थे। वे अपनी बच्ची को सीने से लगाए धीरे – धीरे घर वापस आ जाते हैँ।
सच जानने के बाद पंडित जी को मणि से और ज्यादा स्नेह हो गया था। पंडित जी को दिन रात मणि की सुरक्षा की चिंता रहने लगी थी। जैसे – जैसे मणि बड़ी होने लगी पंडित जी और उनकी पत्नी निरुपमा को ये अहसास हो गया की मणि बोल नहीं सकती हैं। दोनों पति - पत्नी बहुत प्रेम करते थे अपनी बच्ची को। ओर मन ही मन चिंतित भी रहते थे की आठ पुत्रों के बाद एक पुत्री दी ईश्वर ने वह भी गूंगी हैं। पंडित जी पाठशाला चले जाते थे, ओर निरुपमा के पास कोई ना कोई मरीज इलाज के लिए आता रहता था। इस तरह निरुपमा भी सारा दिन व्यस्त रहती थी। धीरे-धीरे मणि पांच साल की हो गयी। अचानक से मणि बीमार रहने लगी, खाना पीना सब छोड़ दिया। निरुपमा एक बैध थी परन्तु निरुपमा को भी मणि की बीमारी समझ में नहीं आ रहा था। मणि का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था ऐसा लग रहा था मानो मणि बहुत तकलीफ में है। परन्तु मणि बोल नहीं सकती थी इस लिए वह अपनी तकलीफ बता नहीं पर रही थी। एक सुबह पंडित जी गुरुकुल जाने से पहले मणि की आँखों पर पट्टी बांध कर चले जाते है और पत्नी से बोल कर जाते हैँ जब तक मैं ना आऊँ कोई पट्टी नहीं खोलेगा। निरुपमा प्रश्न तो पूछना चाहती थी किन्तु पति की आज्ञा जान कुछ नहीं पूछा। ये सिल सिला बन गया, पंडित जी जाने से पहले मणि की आँखों पर पट्टी बांध कर चले जाते थे, गुरुकुल से वापस आने के बाद पट्टी खोल कर बड़े प्यार से मणि को नहलाते और खाना खिलाते। आश्चर्य मणि धीरे-धीरे ठीक होने लगी, चेहरे पर रौनक लौट आयी थी। आठों भाई और पिता के क्षत्र छाया में मणि धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। निरुपमा से रहा नहीं गया वह एक दिन पंडित जी से पूछ बैठी स्वामी ये कैसी बीमारी हो गयी थी हमारी बच्ची को और ये आपने कैसा इलाज किया , मैं कुछ समझ नहीं पायी।
पंडित जी हँसते हुए बोले – ये एक लम्बी कहानी हैं। और इलाज भी थोड़ा लम्बा चलेगा। जबतक मणि समझदार नहीं हो जाती। निरुपमा बोली – कहानी कैसी कहानी स्वामी, और उस कहानी से हमारी मणि का क्या सम्बन्ध हैं।
पंडित जी हँसते हुए बोले – इसके लिए तो तुम्हें कहानी सुननी पड़ेगी…….
दोस्तों आज मैं अपनी दूसरी कहानी नील मणि की श्रृंखला शुरू करने जा रही हूँ,इसे पढ़ कर कमेंट में जरुर बताये की मेरी कहानी कैसी लगी, और आगे की कहानी के लिए जुड़े रहिये मेरे ब्लॉग https://www.mystoriess.com/ से
Nice story
ReplyDeleteNice story
ReplyDelete👍👍
ReplyDeleteVery Nice
ReplyDeleteNice story
ReplyDeleteNice story
ReplyDeleteGood story
ReplyDeleteNice line
ReplyDeleteJi bahut bahut dhanyvad aapka itni sunder samiksha dene ke liye
ReplyDelete