नील-मणि (पार्ट 3)
नील मणि पार्ट 3
क्या होगा हिंदी कहानियों
का भविष्य, क्यों गुम हो रहे है ये बच्चे इस मोबाईल में, क्यों खेल के मैंदान सुने
पड़ रहे है, इन सवालों के जवाब यदि हम धुन्ढ़ेगें तो भी हमें नहीं मिलेंगा, क्यों की
आज के इस डिजिटल दूनियाँ में बच्चों को मोबाईल से दूर रखना असंभव हैं, ऑनलाइन
पढ़ाई, ऑनलाइन खेल, ऑनलाइन वर्क सब कुछ मोबाईल से हो रहा है, किताबे भी ऑनलाइन ही
पढ़ते है, इस लिए मेरी एक छोटी सी कोशिश है हिंदी कहानियों को ऑनलाइन लाने की,
नील मणि के पिछले दो पार्ट
में आपने पढ़ा की कैसे पंडित जी और उनकी बच्ची के बिच की ग़लतफ़हमी दूर होती है,
उन्हें पता चलता है की उनकी बच्ची बोल नहीं सकती है, और एक दिन उनकी बच्ची बीमार
हो जाती है, उनकी पत्नी बैध होते हुए भी अपनी बच्ची की बीमारी को समझ नहीं पातीं
हैं, पंडित जी अनोखे तरीके से खुद अपनी बच्ची का इलाज करते हैं, जब उनकी पत्नी उनसे
इस इलाज के बारे में पूछती हैं, तब पंडित जी उन्हें एक कहानी सुनाते हैं,
तो सुनो प्रिय– ये कहानी उज्जैन के राजकुमार आदित्य और वैशाली की राजकुमारी मनोरमा के पुत्र नील की है।
उज्जैन में चारों तरफ चहल पहल थी सारी नगरी फूलो से सजी थी । आज यहां के राजकुमार का विवाह वैशाली की राजकुमारी से होने वाली थी। बारात बड़े धूम धाम से वैशाली पहुंची और बड़े धूम धाम से राजकुमार आदित्य और मनोरमा का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात राजकुमार राजकुमारी मनोरमा को ले कर उज्जैन वापस लौट रहे थे । लौटते वक़्त रास्ते में रात्रि विश्राम के लिए सभी बाराती, राजकुमार आदित्य और राजकुमारी मनोरमा सभी नदी किनारे डेरा डाल दिए। आधी रात के वक़्त कुछ डाकुओ ने जो पहले से घात लगाए बैठे थे, हमला कर दिया। डाकुओ और राजा में युद्ध छिड़ गया। रात्रि में अचानक हमले से राजा के शिविर में अफरा- तफरी मच गयी। बहुत से सैनिक और बाराती मारे गए। राजा मंत्री से बोले आप राजकुमार आदित्य और राजकुमारी मनोरमा को ले कर यहां से निकलिये। मंत्री जी डाकुओ से आँख बचा कर दोनों को ले कर जंगल में दूर निकल गए। जंगल के रास्ते बचते-बचते जब वे लोग महल में पहुँचे तब महल में चारों तरफ शोक फैला हुआ था। राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। राजा की मृत्यु हो चुकी थी। बहुत से सैनिक भी मारे जा चुके थे। इधर राजकुमार आदित्य भी गंभीर रूप से घायल हो चुके थे।
नियति का कैसा खेल है। जहाँ कल चारों तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ थी। आज वहाँ चारों तरफ मातम ही मातम था। चारों तरफ चीख पुकार थी। इधर राजमहल में राजकुमार की स्थिति भी गंभीर थी। और मनोरमा की स्थिति तो सबसे दयनीय थी, विवाह के उपरांत अपने पति का मुख भी नहीं देख पायी थी बेचारी। दुर्भाग्य ने कैसे घेर लिया था। पता नहीं किसकी नजर लग गयी थी इस राज्य को।
परन्तु राज्य को ऐसे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था। विषम परिस्थिति को देखते हुए राजमाता पदमा देवी ने राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले लिया।
उन्होंने एक आपात कालीन बैठक बुलाई उस बैठक में अपने विश्वास पात्र मंत्री राज गुरु, और राज्य के हितैसियो को बुलाया । तत्काल उन्होंने राजकुमार का राज्यविषेक करने का फैसला लिया। हलांकि राजकुमार आदित्य की हालत ठीक नहीं थी। परन्तु राज्य की सुरक्षा और हित को देखते हुए राजकुमार का राज्यविषेक कर दिया गया। और मनोरमा को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया राजमाता ने। राज बैध को बुला कर अच्छे से अच्छे औषधि का प्रयोग कर जल्दी से जल्दी राजकुमार को ठीक करने के लिए कहा गया। परन्तु राजकुमार के स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था। उनके गहरे घाव भर ही नहीं रहे थे। कोई औषधि असर नहीं कर रही थी। मनोरमा की स्थिति भी दिन प्रतिदिन खराब हो रही थी।
फिर एक दिन राजमाता पद्मावती मनोरमा के कक्ष में प्रवेश करती है। राजमाता मनोरमा को बड़े प्यार से अपने पास बैठा कर समझती हैं। पुत्री धैर्य और संयम से काम लो। अब तुम इस राज्य की महारानी हो। तुमसे राज्य को बहुत उम्मीद हैं और तुम्हें इस राज्य का वारिस भी देना है। महाकाल सब ठीक करेंगे। यहां से दूर जंगल में एक ऋषि रहते हैं जो जो अद्भुत बैध भी हैं उनके यहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटा हैं । पुत्री तुम राजकुमार को वहाँ ले कर जाओ। महाकाल तुम्हारी रक्षा करेंगे। मनोरमा राजकुमार आदित्य को ले कर उस ऋषि के आश्रम चली गयी वही एक कुटिया बना कर राजकुमार के साथ रहने लगी। ऋषि जड़ी - बूटी से इलाज करने लगे। वही एक शिव मंदिर था। मनोरमा रोज सवेरे शिव की पूजा करने जाने लगी। एक दिन वो भगवान शिव से बोली हे देव मेरे पति को कुछ हो गया तब मैं अपना जीवन यापन कैसे करूँगी । राजकुमार इस राज्य के इकलौते वारिस है। अगर उन्हें कुछ हो गया तब इस राज्य का क्या होगा। हम सब अनाथ हो जायेंगे। ऐसा बोल कर मनोरमा भगवान शिव के आगे विलाप करने लगी।
मनोरमा के विलाप से भगवान शिव करुणा से भर गए। और भगवान बूढ़े ब्राह्मण का वेश धारण कर आये और मनोरमा से बोले – हे पुत्री शांत हो जाओ ये महाकाल का दरबार हैं। यहां कोई राजा जीवित नहीं रहता, क्युकी यहां के राजा स्वयं महाकाल है। इसलिए हे पुत्री ये भेद जान लो की तुम्हारे पति की मृत्यु निश्चित है। इतना सुनते ही मनोरमा विक्षिप्त सी हो गयी और विलाप करने लगी। बोली – यदि ऐसा हैं तो मैं भी अपने पति के साथ ही अपने प्राण त्याग दूंगी। मैं अपने राज्य को और राजमाता को क्या बोलूंगी। इस राज्य का क्या होगा। इतना सुन ब्राह्मण वेश में आये भगवान शिव बोले – हे पुत्री ऐसे विलाप नहीं करो, ऐसे विलाप करना किसी राज्य कन्या को शोभा नहीं देता। ये एक औसधी है, इसे ले कर जाओ और अपने पति के साथ निवास करो। नौ महीने पश्चात तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होंगी। परन्तु तुम्हारे पति की मृत्यु हो जाएगी। मनोरमा ने औषधि लेने से मना कर दिया।। और हाथ जोड़ कर बोली हे ब्राह्मण देव आज मेरे पति राजा बने तो मेरे पति की मृत्यु हो जाएगी, कल जब पुत्र बड़ा होकर राजा बनेगा तब उसकी मृत्यु हो जाएगी। कल मेरे ही तरह कोई निर्दोष राजकुमारी इस सिंहासन की बली चढ़ेगी। इससे अच्छा मैं अपने पति के साथ ही अपने प्राण त्याग दूँ। हे ब्राह्मण देव पुत्र के जन्म के बाद मेरी मृत्यु हो जाये परन्तु राजकुमार को जीवन दान दीजिये प्रभु।
ब्राह्मण वेश में आये भगवान शिव बोले – ऐसा नहीं हो सकता पुत्री, परन्तु मैं तुम्हारी पति भक्ति और राज्य के प्रति निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हूं। इस लिए तुम्हारे पुत्र की लम्बी आयु का उपाय बता सकता हुँ। सुनो राजकुमारी तुम अपने राज्य की राजधानी महाकाल मंदिर की सीमा से दूर ले जाओ।
राज्याभिषेक अपने पुत्र का नहीं महाकाल का करो। सर पर मुकुट धारण कभी ना करें। राजा के रूप में नहीं महाकाल के प्रतिनिधि के रूप में राज्य करें। राज्य की सारी सम्पति महाकाल की सम्पति है, प्रतिदिन अपने कार्य का परितोष ले, चुकी वह राजा होगा इसलिए महल के प्रतिष्ठित लोग तय कर राजकार्य के बाद जो भी निजी कार्य होगा वह उसके परितोष में मिली धन राशि से ही हो। जब तक तुम्हारा पुत्र इन नियमों का पालन करेगा तब तक वह जीवित रहेगा। तुम्हारा पुत्र ही नहीं कोई भी राजा जीवित रहेगा।
इतना बोल कर महाकाल वहाँ से चले जाते है । धीरे-धीरे समय बीतने लगा। राजकुमारी मनोरमा ने एक साथ दो बच्चों को जन्म दिया। एक पुत्र और एक पुत्री, दोनों ही महाकाल के अंश थे। दोनों ही के महाकाल के समान माथे पर तीसरी आँख थी। राजमहल में सूचना भेज दी गयी। रानी ने दो शिशुओं को जन्म दिया है। परन्तु राजकुमार की मृत्यु हो गयी है। राजमाता आयी और वही कुटिया में राजकुमार का अंतिम संस्कार किया और रानी मनोरमा और दोनों शिशुओं को ले कर राजमहल लौट आयी। दोनों शिशु बहुत ही सुन्दर थे। दोनों के मस्तक पर तीसरी आँख थी। दिव्य अलौकिक रूप था, जैसे भगवान शिव बाल रूप ले कर आ गए हो। बाल घुँघराले बड़ी-बड़ी कजरारे आँखें बहुत ही दिव्य रूप था दोनों ही बच्चों का। दोनों राजमहल में बड़े होने लगे। राज्य में खुशियाँ लौट आयी थी।
आहिस्ता – आहिस्ता दोनों बच्चे राजमहल में बड़े होने लगे। पुत्र का नाम नीलकंठ और पुत्री नाम नीलाक्षी रखा राजमाता ने । धीरे – धीरे पांच वर्ष बीत गए। सब ठीक चल रहा था।
एक शाम की बात है राजकुमार नील बगीचे में खेल रहे थे। तभी एक नागिन की दृष्टि राजकुमार नील पर पड़ी । बालक का दिव्य रूप देख कर नागिन स्तब्ध रह गयी । नागिन राजकुमार नील को अपलक निहारती रह गयी। नागिन ने मन ही मन कहा – कौन है ये बालक,ऐसा लग रहा है मानो भगवान शंकर बाल रूप में धरती पर आ गए हो । बगीचे के कोने में छिप कर नागिन बालक को कीड़ा करते देखने लगी। ऐसे करते बहुत देर हो गयी नागिन को समय का पता ही नहीं चला । रात्रि आरम्भ हो गया। बालक महल लौट गया। नागिन ने बगीचे में रात गुजारी। सुबह होने पर किसी की नजर ना पड़ जाये इसलिए नागिन बगीचे के एक कोने में छिप कर बैठ गयी। सोचा अंधेरा होने पर अपने लोक लौट जाएगी । और मन ही मन ये सोच रही थी की जाने से पहले उस बालक के दर्शन हो जाते तो मैं धन्य हो जाती। वह ऐसा सोच ही रही थी तभी राजकुमार नील हाथों में गेंद लिए बगीचे में प्रवेश करते है। नागिन राजकुमार नील को देख कर मन ही मन उन्हें प्रणाम करती है। राजकुमार नील गेंद को इधर उधर फेंक कर खेलने लगते है। तभी गेंद नागिन के ठीक बगल में जा कर गिरता है। राजकुमार नील वही से बोलते है, गेंद तुम्हें लग जाती तो, अपना ख्याल नहीं रखती हो! नागिन चौक गयी, वह चौक कर इधर – उधर देखने लगती है.। कोई उसके आस – पास में तो नहीं है। राजकुमार नील दोबारा बोलते है -इधर उधर क्या देख रही हो तुम्हें ही बोल रहा हुँ। नागिन सामने देखती है राजकुमार नील सामने खड़े थे, और मुसकुरा रहे थे। जितना रूप अद्भुत है वाणी में भी उतनी ही मिठास है,जैसे मिश्री घुली हो।
नागिन बोली – आपने मुझे देख लिया है।
राजकुमार नील बोलते है – हां कल ही देख लिया था मैंने तुम्हें। तुम्ही ने तो बुलाया मुझे इसलिए तो मैं बगीचे में आया हुँ। नील गुस्सा करते हुए बोलते है – अपना ध्यान नहीं रखती हो। अब रात्रि होने को है., अपने लोक लौट जाओ। यदि किसी ने तुम्हें यहां देख लिया तो अनर्थ हो जायेगा। नागिन बोलती है आप मेरी चिंता ना करें। राजकुमार परन्तु आपको मुझसे भय नहीं लगता।
राजकुमार हँसते है, और बोलते है – क्या मुझे तुमसे डरना चाहिए!
नागिन यह सुन कर स्तब्ध थी। उसने कहा मैं सर्प हुँ, विष धारी यदि मैं किसी को काट लू तो उसकी मृत्यु हो जाती है।
राज कुमार नील ने दोबारा प्रश्न किया- तो क्या तुम मुझे काटने आयी हो नागिन चुप ही रहती है। राजकुमार नील ने एक छोटी सी कटारी निकल कर दिखाते हुए बोले मैं भी तुम्हें इस कटारी से मार सकता हुँ, परन्तु तुम्हें तो हर खतरे की आहट मिल जाती है। तो क्या मेरे यहां आने पर तुम्हें खतरे का अहसास नहीं हुआ।
इस बार नागिन हंसने लगती है। नागिन मंत्र-मुग्ध सी उस छोटे से बालक को देखती रह जाती है। तभी नील को अपनी माता जी की आवाज सुनाई पड़ती है। नील महल में जाने लगते है और बार – बार पीछे मुड़ कर देखते हुए नागिन को इशारे से बोलते है अपने लोक लौट जाओ, यहां खतरा मुझे नहीं तुम्हें है। दूसरे दिन राजकुमार प्रातः ही बगीचे में आ जाते है। नागिन बगीचे के कोने में छिप कर विश्राम कर रही थी राज कुमार को देख कर बाहर निकल आयी और राजकुमार से बाते करने लगी। घंटों दोनों आपस में बाते करते रहे। समय कैसे बीत गया उन्हें पता ही नहीं चला। राजकुमार प्रातः आने के लिए बोल कर महल में चले गए। परन्तु दूसरे दिन प्रातः राजकुमार बगीचे में नहीं आये। नागिन बार – बार महल की ओर देख रही थी। सुबह से शाम हो गयी, नागिन सारा दिन राजकुमार का इंतजार करती रही। रात हो गयी। राजकुमार का कुछ पता नहीं चला। नागिन अत्यंत व्याकुल थी। राजकुमार की चिंता होने लगी थी नागिन को। ये सब राजकुमारी नीलाक्षी अपने खिड़की से देख रही थी। नागिन को अत्यंत व्याकुल देख कर राजकुमारी नीलाक्षी से रहा नहीं गया वह बगीचे में आकर नागिन को आवाज लगाई। बोली – ऐ नागिन आज राजकुमार अस्वस्थ है, जिस के कारण वे आज बगीचे में नहीं आएंगे। परन्तु नागिन तो राजकुमार नील की चिंता में खोयी थी, उसे राजकुमारी नीलाक्षी की बाते सुनाई नहीं दी । नागिन राजकुमार के लिए अत्यंत व्याकुल थी, वह खिड़की के रास्ते महल में प्रवेश करने लगी। राजकुमारी नीलाक्षी ने फिर से कहा – ऐ नागिन महल में प्रवेश ना कर वहाँ खतरा है. परन्तु नागिन को कुछ सुनाई नहीं दिया। नागिन ने पलट कर भी नहीं देखा। जिस कारण राजकुमारी नीलाक्षी को बहुत गुस्सा आ गया। नागिन ने राजकुमारी की बातों को अनसुना कर दिया, जिसे राजकुमारी ने अपना अपमान समझ लिया। राजकुमारी नीलाक्षी ने मन ही मन नागिन को सबक सिखाने के लिए ठान लिया। वह धीरे-धीरे नागिन के पीछे चलने लगी। नागिन ने राजकुमार नील के कक्ष में प्रवेश किया। नागिन ने राजकुमार नील को आवाज लगाई । राजकुमार ने आँखें खोल कर देखा, नागिन वहाँ फर्श पर बैठी है। राजकुमार नील बोले – आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था। जिस कारण मैं आज बगीचे में नहीं आ पाया। परन्तु तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए। यहां संकट है इसलिए तुम जल्दी से वापस चले जाओ। जा कर बगीचे में छुप जाओ। मैं प्रातः तुमसे मिलने अवश्य आऊंगा। इतना बोल कर राजकुमार बिस्तर से उठे और नागिन से बोले – चलो मैं तुम्हें बाहर तक छोड़ कर आता हुँ ।
नागिन बोली नहीं राज कुमार आपका स्वस्थ ठीक नहीं है। आप विश्राम कीजिये, मेरे कारण आपको तकलीफ हुई इसके लिए आप मुझे क्षमा कीजिये । आप विश्राम कीजिये व्यर्थ में मेरी चिंता नहीं कीजिये। मुझे किसी ने नहीं देखा । मैं चुप चाप चली जाऊंगी और प्रातः बगीचे में आपकी प्रतीक्षा करूँगी। इतना बोल कर नागिन जाने लगी । नील ने कहा अपना ख्याल रखना। नागिन राजकुमार के कक्ष से बाहर निकल गयी। तभी राजकुमारी नीलाक्षी दौड़ कर राजमाता के कक्ष में जाती और बोलती है राजमाता राजकुमार नील के कक्ष में एक विषैला सर्प घुस आया है मैंने अपनी आँखों से देखा है अभी – अभी राजमाता सिपाहियों के साथ दौड़ते हुए नील के कक्ष में प्रवेश करती है, तभी बाहर से आवाज आती है। इधर देखिये यहां है सर्प , और थोड़ी ही देर में लाठी डंडो से मार डालते है। कोलाहल सुन कर राजकुमार नील कक्ष से बाहर आते है। तो देखते है सिपाही डंडो से एक सर्प को पिट रहे है। राजकुमार नील सिपाहियों को रोकते है। सिपाही रुक जाते है । राजकुमार नील बोलते है इस सर्प ने आपका क्या बिगाड़ा है जो आप सब इसे मार रहे है। एक सिपाही बोला - हुजूर ऐ एक विषैला सर्प है यदि ये किसी को काट ले तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजकुमार ने दोबारा प्रश्न किया तो क्या इसने किसी को काटा है या काटने का प्रयास किया है। जो आप सब ने इस निर्दोष की हत्या कर दी। राजमाता खामोश थी। और मन ही मन सोच रही थी की उनसे बहुत बड़ी गलती हो गयी, तभी राजकुमार बोल पड़ते है , गलती नहीं राजमाता अपराध हुआ है आपसे अपने एक निर्दोष की हत्या की है। इतना बोल कर राजकुमार नील अधः मारे सर्प को उठा लेते है जो वह नागिन थी, एक सिपाही उन्हें रोकने की कोशिश करता है। राजकुमार नील उन्हें गुस्से से देखते है। राजमाता सभी को चुप रहने के लिए इशारा करती है। राजकुमार नागिन को हाथों में उठा कर बगीचे की ओर जाते है। उनकी आँखों से आंसू भी रहे थे। वह खून से लथ - पथ नागिन को जो आख़िरी सांस ले रही थी बगीचे के एक कोने में रख देते है। राजकुमार नील हाथ जोड़कर नागिन से क्षमा मांगते है बोलते है – नागिन मेरे परिवार से अनजाने में ये अपराध हो गया है इन्हें क्षमा कर दो। नागिन बोलती है – हे राजकुमार मैंने आप सभी को क्षमा कर दिया, मेरे मन में आपके परिवार के लिए कोई मेल नहीं है। आपको मेरे लिए अपराध बोध करने की आवश्यकता नहीं। परन्तु राजकुमार मेरे जाने के बाद मुझे ढूंढता हुआ मेरा नाग नागेश अवश्य आएगा, वह अत्यंत विषैला और क्रोधित स्वभाव का है। इसलिए हे राजकुमार आप अवश्य सतर्क रहिएगा। परन्तु आप मुझे वचन दीजिये – आप नागराज की हत्या नहीं करेंगे इतना बोल कर नागिन ने दम तोड़ दिया। राजकुमार नील रोने लगते है। सुखी लकड़ी चुन कर लाते है, और वही बगीचे में ही एक कोने में अपने हाथों से अंतिम संस्कार करते है। राजमाता दूर से सारा दृश्य देख रही थी। उन्हें ये आभास हो जाता है की इस बालक के केवल तीन आँखें ही नहीं अपितु इस बालक में दिव्य शक्ति भी है। राजमाता राजकुमार नील के पास आती है. उन्हें अपने साथ महल ले जाती है।
राजकुमार उदास बैठे है उसी स्थान पर जहाँ उन्होंने नागिन को जलाया था। उसी स्थान को निहारते रहते है। बैठे - बैठे कब शाम हो गया उन्हें पता भी नहीं चला। माता की आवाज सुनकर उनका ध्यान भंग होता है। राजकुमार महल लौट आते है। नील अपने कक्ष में उदास बैठे है । राजमाता कक्ष में प्रवेश करती है , राजकुमार नील को उदास देख कर उन्हें समझती है। अपने मन पर कोई बोझ ना ले, जो हुआ उसे बुरा स्वप्न समझ कर भूल जाये ।
राजकुमार के सर को अपने गोद में ले कर थपथपा कर सुलाने लगी।
तभी राजकुमारी नीलाक्षी कमरे में प्रवेश करती है. राजमाता के गोद में नील को सोये देख कर बोलती है – दादी माँ आप मेरे साथ मेरे कक्ष में चलिए। क्यों की मुझे अकेले अपने कक्ष में भय लग रहा है। ऐसा लग रहा है मानो कोई विषैला सर्प मेरे कक्ष में घुस आया हो। राजमाता राजकुमारी को समझाती है, भयभीत होने की जरूरत नहीं है। राजकुमार नील को सुला कर आपके साथ आपके कक्ष में चलती हुँ। परन्तु राजकुमारी नीलाक्षी हठ करने लगती है। नील ने कहा – दादी माँ आप बहन नीलाक्षी के साथ चले जाये। मुझे भय नहीं लग रहा है। इतना सुन कर दादी माँ हँसते हुए राजकुमारी के साथ जाने लगती है। राजकुमारी नीलाक्षी राजमाता की उँगली पकड़े हुए राजकुमार के कक्ष से बाहर जाने लगती है, और मुड़–मुड़ कर राजकुमार नील को देखती है। उसके मुखड़े पर एक कुटिल मुस्कान थी। ये देख कर राजकुमार नील चौक जाते है। वे उठ कर बैठ जाते है और सोच में पड़ जाते है । वे सोचते है की बहन नीलाक्षी ऐसे व्यंग से क्यों मुसकुरा रही थी। उनकी मुस्कान में अवश्य कोई रहस्य है । कही बहन नीलाक्षी ने जान बूझ कर छल से नागिन को मरवा डाला? ये विचार आते ही राजकुमार नील भयभीत हो जाते है। उन्हें खतरे का आभास होने लगता है। नहीं नहीं बहन नीलाक्षी ऐसा नहीं कर सकती। वे मन ही मन बोलते है, कही अब नागराज की बारी तो नहीं है। राजकुमार इन्हीं विचारों में खोये थे की तभी एक काला विषैला सर्प पीछे से आ कर उन्हें जकड़ लेता है। राजकुमार ने उस सर्प की गर्दन पकड़ ली और पूछा तुम कौन हो,और तुमने मुझे ऐसे क्यों जकड़ रखा है। नाग बोला - मैं नागराज नागेश हुँ. और तुम लोगों ने मेरी पत्नी की हत्या की है इसलिए मैं तुम सब से अपनी पत्नी की हत्या का बदला लूंगा। राजकुमार नील समझ गए की ये उस नागिन का पति नागराज है। तब उन्होंने नागराज से कहा – नागराज सुनिए- अपने क्रोध को त्याग कर पहले मेरी पूरी बात सुनिए। मेरी बात सुनने के बाद भी यदि आपको ऐसा लगे की मैंने आपकी पत्नी की हत्या की है तो आप अवश्य मेरी हत्या कर दीजिये गा। परन्तु नागराज बहुत गुस्से में था वह कोई बात सुनने के लिए तैयार नहीं था। उसने राजकुमार को जोर से जकड़ रखा था और उनके हाथों से अपनी गर्दन छुड़ा कर उन्हें डसने का प्रयास करने लगा। परन्तु राजकुमार ने भी नागराज की गर्दन पकड़ रखी थी। उन्होंने अपनी पकड़ थोड़ी और मजबूत कर दी, नागराज का दम घुटने लगा, आहिस्ता – आहिस्ता नागराज की सारी शक्ति जवाब देने लड़ी जिससे उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी । अब नागराज एक रस्सी की भांति राजकुमार की हाथों में लटका हुआ था।
तब राजकुमार ने कहा – मैंने कहा था ना पहले मेरी बात सुन लो, व्यर्थ में इतना प्रयास नहीं करो। जब नागराज की सारी शक्ति क्षीण हो गयी तब नागराज का गुस्सा भी शांत हो गया। वह राजकुमार से बोला- मुझे छोड़ दो मैं वचन देता हुँ की मैं पहले तुम्हारी बात सुनूंगा। तत्पश्चात कोई भी निर्णय लूंगा। इतना बोल कर नागराज मन ही मन सोचने लगता है की ये तीन आँखों वाला बालक कौन है, ये कोई साधारण बालक तो नहीं है , ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् भगवान शिव का बाल रूप हो। नागराज मन ही मन भगवान शिव का ध्यान कर उन्हें प्रणाम करता है और बोलता है हे प्रभु ये आपकी कैसी लीला है. राजकुमार मुसकुराते है और जब उन्हें एहसास हो जाता है की नागराज का गुस्सा शांत हो गया है तब वो आहिस्ता से नागराज को भूमि पर रखते है। और बोलते है नागराज मैं शिव नहीं हुँ। मैं शिव पुत्र हुँ क्यों की मेरी माता कहती है कि मेरा जन्म शिव कृपा से हुआ है। मेरा नाम नील है। यही भ्रम तुम्हारी पत्नी को भी हो गया था। मैंने तुम्हारी पत्नी को नहीं मारा है। अपितु मैंने तो उसे खतरे से सावधान भी किया था। कहा था लौट जाये अपने लोक, परन्तु वह तो शिव की दीवानी मुझे शिव समझ मेरे आगे पीछे घूम रही थी। उसे तो चारों तरफ शिव के दर्शन कर रही थी। उसकी आँखों में अथाह प्रेम था, भक्ति थी, शिव के लिए। उसे मृत्यु का तनिक भी भय नहीं था। हे नागराज मृत्यु से पहले ही उसने आपका ही नहीं बल्कि समस्त संसार का मोह त्याग दिया था उसने। उसने अपनी आँखों पर शिव भक्ति, शिव प्रेम की पट्टी बांध लिया था। शिव के भ्रम में मेरे पीछे -पीछे चल रही थी। मैंने तो उससे कहा – मैं शिव नहीं हुँ एक साधारण बालक हुँ परन्तु तुम्हारी पत्नी को मुझसे प्रेम हो गया था। हे नागराज वो देखो बगीचे के उस कोने में तुम्हारी पत्नी को तुम्हारी नहीं मेरी चिंता है । वह मरने के बाद भी धरती छोड़ कर नहीं गयी है उसे यही चिंता है की तुमसे मेरी रक्षा कैसे करें। नागेश राजकुमार नील को देखता है एक छोटा सा बालक, आँखें बड़ी – बड़ी, बाल घुँघराले, ललाट पर तीसरी आँख ऐसा लग रहा था मानो साक्षात् शिव का बाल रूप हो । वाणी में मिठास ऐसी जैसे मिश्री घुली हो। बालक ही बाते सुन कर नागेश हंसने लगता है, वह हंस कर बोलता है तुम एक छोटे से बालक हो और मैं एक शक्तिशाली सर्प , और वह भी अत्यंत विषैला हुँ। इसलिए नागिन चिंतित है। राजकुमार नील बोलते है – शक्तिशाली अथार्त तुम शिव से ज्यादा शक्तिशाली हो। नागेश बोलता है नहीं, शिव तो सर्व शक्तिमान है। वे तो देवों के देव महादेव है, शिव महाकाल है, शिव आदि है, अंनत है, शिव में सारी सृष्टि है, सारी सृष्टि में शिव है, शिव से प्रेम सारी सृष्टि से प्रेम है, शिव से प्रेम मोह, नहीं मोक्ष। राजकुमार नील नागेश की बाते बहुत ही ध्यान से सुन रहे थे। शिव की बाते सुन नील बहुत ही आनंद का अनुभव कर रहे थे। बालक की जिज्ञासा देख नागराज नागेश ने भगवान शिव की बहुत सी बाते बताई और बोले – हे राजकुमार नील तुम्हारी माता सत्य कहती है तुम्हारा जन्म शिव कृपा से हुआ है। तुम्हारा दे दिव्य रूप, तुम्हारे अंदर ये दिव्य शक्तियां मुझे तुम्हारे शिवांश होने का अनुभव करा रहे है। हे बालक बहुत से शिवांश हुए, जब उन्हें अपनी शक्ति का पता चला उन्होंने अपनी शक्ति के मद में इस सारी सृष्टि को खतरे में डाल दिया था। इसलिए हे बालक तुम अपने हृदय में हमेशा शिव का निवास रखना। अपने हृदय में प्रेम का निवास रखना। सदैव क्रोध पर नियंत्रण रखना क्षमा शील बनना। इतना बोल कर नागेश बगीचे की ओर चल दिया, पीछे-पीछे नील भी चलने लगे। नागेश बगीचे में जहाँ नागिन की आत्मा थी वहाँ गए। वहाँ जा कर नाग नागिन से बोला- प्रिय मैंने राजकुमार नील और उसके समस्त परिवार को क्षमा कर दिया। अब तुम निश्चिंत हो कर अपनी मृत्यु स्वीकार करो ओर धरती छोड़ कर चले जाओ। इतना सुन नागिन की आत्मा अनंत ब्रम्हांड में विलीन हो गयी। ओर नागराज भी अपने लोक लौट गए।
राजकुमार नील उदास उस स्थान पर खड़े रहते है। राजमाता जो दूर से ये सारा दृश्य देखते रहती है। राजकुमार के पास आती है ओर नील को अपने साथ महल ले जाती है। उन्हें अहसास हो गया था की राजकुमार नील कोई साधारण बालक नहीं। इनके अंदर दिव्य शक्तियां है।
राजकुमार नील अपने कक्ष में उदास बैठे थे, तभी नीलाक्षी उनके कक्ष में प्रवेश करती है। राजकुमार नील बोलते है – बहन ये आपने ठीक नहीं किया। आपने एक निर्दोष की हत्या कर दी ।नीलाक्षी बोली – मैंने तो उसे सावधान किया था, बार-बार रोका था, परन्तु उसने मेरी बातों को ना केवल अनसुना किया बल्कि मेरी अवहेलना भी की। इसका परिणाम तो उसे भुगतना ही था।
राजकुमार नील बोलते है – परिणाम उसे नहीं आपको भुगतना पड़ा है बहन। दंड उसे नहीं आपको मिली है।
राजकुमारी नीलाक्षी आश्चर्य से नील को देखती है।
नील बोले है – ऐसे आश्चर्य से क्यों देख रही है बहन आप मुझे। आप यहां मेरे ओर नागराज के बिच क्या वार्तालाप हुई ये जानने आयी है। परन्तु बहन आप नागिन की बाते सुन सकती थी तो नागराज की बाते क्यों नहीं सुन पायी ये सोचा आपने। आप अपने क्रोध में इतनी अंधी हो गयी की आपको ये पता भी नहीं चला की आपसे आपकी एक दिव्य शक्ति छीन ली गयी है।
गुस्से से नीलाक्षी बोलती है- सर्प एक तुच्छ प्राणी है उसकी हत्या के लिए भोले - शंकर ने मुझसे एक दिव्य शक्ति छीन ली। ये ठीक नहीं किया भोले नाथ ने। राजकुमार नील उन्हें बिच में ही रोकते है बोलते है – उन्होंने शक्ति दी ओर उन्होंने छीन लिया, परन्तु आपने क्या किया। उस तुच्छ, निर्दोष. प्राणी को मरने के लिए छल का प्रयोग किया। आपको ये अच्छी तरह से ये पता था की उसका इरादा किसी को नुकसान पहुंचना कतई नहीं है। केवल क्रोध के कारण आपने उसकी हत्या कर दी। सावधान बहन नीलाक्षी दोबारा कोई ऐसा काम नहीं कीजिये गा जिससे आपको नुकसान उठाना पड़े।
इतनी कहानी सुना
कर पंडित जी चुप हो गए। निरुपमा बोली स्वामी इस कहानी का मेरी बच्ची के बीमारी से
क्या सम्बन्ध है। भोर हो गयी है प्रिय। मुझे नदी स्नान के लिए जाना है। लौट कर आगे की कहानी सुनाता हुँ।
इतना बोल कर पंडित जी नदी स्नान के लिए चले गए। स्नान कर जब पंडित लौटे तो देखा
गुरुकुल से संदेश ले कर एक विद्यार्थी आया हुआ है। सन्देश पढ़ कर पंडित जी निरुपमा
से बोले - मुझे इसी वक्त गुरुकुल जाना होगा। ब्रह्मदत जी ने बुलाया है। (ब्राह्मदत
स्वामी उस गुरुकुल के प्राचार्य है जिस गुरुकुल में शिवानंद पंडित अध्यापक का
कार्य करते है। इसीलिए लोग उन्हें पंडित शिवानंद आचार्य के नाम से जानते है।) कुछ
विशेष कार्य हेतु शीघ्र बुलाया है। इतना बोल कर पंडित शिवानंद आचार्य गुरुकुल चले
गए
नमस्ते दोस्तों मैं अल्पना सिंह नील मणि की आगे की कहानी लेकर आई हूँ आप लोग कमेंट कर जरुर बताईये, की मेरी कहानियों की श्रिंखला कैसी लगी, और आगे की कहानी के लिए जुड़े रहिये मेरे ब्लॉग https://www.mystoriess.com/ से धन्यवाद,
Nice story 😊
ReplyDeleteNice story
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