श्रीधर पंडित (भाग-3)
नमस्ते दोस्तों ,
मैं अल्पना सिंह , मैंने इस कहानी को हास्य रंग दे कर लिखा है ,लेकिन ये हमारे जीवन की कड़वी सच्चाई है, हम बिना बात किये ,बिना सोचे -समझे किसी भी बात का अपने दिमाग से मतलब निकाल लेते हैं, इससे हमारे रिस्तो में ग़लतफ़हमी हो जाती है और हमारे रिस्तो में कड़वाहट हो जाती, ये केवल दोस्ती में ही नहीं होता, ये किसी भी रिश्ते में लागु होता हैं, चाहे ओ पति-पत्नी हो ,भाई-बहन हो, माँ-बेटी हो, भाई-भाई हो ,या फिर पड़ोसी ही क्यों न हो, किसी बात को ले कर यदि हमें संसय हो तो हम सामने से बात कर उसे सुलझा ले तो बहुत ही अच्छा परिणाम होगा, एक दुसरे से बात करने से किसी भी समस्या का समाधान निकल सकता है, और रिश्ते में प्रेम भी बना रहेगा,
पिछली कहानी श्रीधर पंडित भाग2 में आपने पढ़ा श्रीधर को उसकी बिटिया कैसे मिली, लेखक अपने दोस्त के लिए परेशान है आगे –
पुरानी बातें दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे थे, मैंने मोबाइल उठाकर उसमें टाइम देखा सुबह के 4:00 बज गए थे, करवट बदल कर देखा श्रीधर गहरी नींद में था, अक्सर वह अभी तक उठ जाया करता था, मैं उठा और छत पर चला गया, मैं रात भर सो नहीं पाया था, इसलिए मैं थोड़ी देर खुली हवा में सांस लेने के लिए छत पर टहलने लगा, थोड़ी देर में श्रीधर भी चला आया, श्रीधर बोला क्या बात है संजीव आज जल्दी उठ गए। मैंने कहा हां मुझे आज बैंक जल्दी जाना है। इतना बोल कर मैं नहाने चला गया। मुझे बैंक जाना था। मैंने चाय ब्रेड टेबुल पर रख दिया। चाभी श्रीधर के हाथ में रख दी और
कहा डब्बे वाला दोपहर का खाना देकर जाएगा खाना खा लेना। मेरा इंतजार नहीं करना क्योंकि बैंक में आज मीटिंग है। मैं शाम तक आऊंगा। श्रीधर कुछ बोलना चाहता था लेकिन मैंने सुना नहीं, क्योंकि मुझे देर हो रही थी, शाम को बात करता हूं बोल कर निकल गया, शाम को जब मैं घर आया तब मैंने देखा जय आया हुआ है। जय और श्रीधर आपस में बातें कर रहे थे। मैं भी वहीं बैठ गया। कुछ कागज बैंक में जमा करने थे, जय वहीं देने आया था। मैं और जय आपस में बातें करने लगे। श्रीधर उठकर किचन में चला गया। मैंने जय से श्रीधर को काम पर रखने के लिए कहा। जय थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला स्टोर में एक जगह खाली है, अगर पंडित जी चाहे तो कल से ही वहां आ जाए। जय ने श्रीधर को पंडित जी कह कर संबोधित किया। तब तक श्रीधर चाय लेकर आ गया और उसने मेरे और जय की बातें भी सुन ली थी। कमरे में आते ही श्रीधर ने हां कह दिया। जय ने हंसते हुए कहा पंडित जी के रहने का भी इंतजाम वही कर देता हूं, मैं बोला- नहीं भाभी जी को भी लाना है यही इसलिए, जय बीच में ही बोल पड़ा -अरे कोई बात नहीं 2BHK फ्लैट है । स्टोर से लगे हुए हैं, कोई दिक्कत नहीं होगी। फिर जय ने चाय पी और चला गया। मैंने श्रीधर से कहा- भाभी जी को यही बुलवा लो धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। मैं भी नहीं चाहता था कि श्रीधर वापस अपने गांव जाए।
श्रीधर और मैं तैयार होकर जय के मॉल पहुंचते हैं। जय वहां पहले से ही खड़ा था। जय ने हंसते हुए मेरा और श्रीधर का स्वागत किया। जय ने मुझे और श्रीधर को स्टोर दिखाया स्टोर से सटे ही फ्लैट था हम दोनों ने फ्लैट भी देख लिया। दो रूम लेट्रिन, बाथरूम, किचन का फ्लैट था। जय स्टोर और फ्लैट की चाबी श्रीधर को देते हुए बोला अब यह स्टोर और फ्लैट दोनों आपकी जिम्मेदारी हुई पंडित जी। मैंने जय को धन्यवाद किया। जय ने कहा अरे इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं श्रीधर को वही छोड़कर बैंक निकल गया। कार में बैठते वक्त मैंने पीछे मुड़कर श्रीधर को देखा, श्रीधर वहीं खड़ा मुसकुरा रहा था। माथे पर चंदन का टीका कांधे पर लाल गमछा मैं मन ही मन मुसकुरा उठा। आज श्रीधर को इस वेश में देखकर और भी कुछ यादें ताजा हो गई। श्रीधर पहले शर्ट पैंट ही पहनता था। बोर्ड पास करने के बाद हम तीनों दोस्तों ने शहर में कदम रखा। इंटर में एडमिशन ले कर। कारण हमारे गांव का स्कूल बोर्ड तक ही था 2 घंटे का रास्ता था हमारे गांव से जिले तक का। 2 घंटे आना और 2 घंटे जाना कुल 4 घंटे हो गए। प्रतिदिन 4 घंटे बस से सफर कर पढ़ाई कर पाना मुमकिन नहीं था। इसलिए हम तीनों को आदेश हुआ कि हम किराए पर एक कमरा ले लें। और अपनी आगे की पढ़ाई करें। ऐसा नहीं था कि हम पहले जिला में नहीं आए थे। आए थे, कभी अम्मा के साथ डॉक्टर के पास, कभी पिताजी के साथ कपड़े खरीदने, कभी बड़े भैया के साथ दशहरे का मेला देखने, हम हमेशा मां का हाथ पकड़े हुए, पिताजी के पीछे-पीछे, बड़े भैया के देखरेख में ही जिला आए थे। यह पहली बार था जब हम अकेले जिला में रहने वाले थे। और यहां हमारा परिचय शहर से होने वाला था। हमारा जिला बहुत बड़ा तो नहीं था। लेकिन हमारे गांव से जरूर बड़ा था। बड़ा क्या बहुत बड़ा था। 2 सिनेमा हॉल 4 बड़े-बड़े मॉल, बैंक, तीन कालेज, कई प्राइवेट स्कूल, हाई स्कूल, सदर हॉस्पिटल के साथ-साथ कई प्राइवेट क्लिनिक। हमारे गांव में क्या चार पांच गांव मिलाकर एक हाई स्कूल था। एक आंगनबाड़ी, चार – पांच गांव मिलाकर एक स्वास्थ्य केंद्र, जिसमें केवल एक डॉक्टर थे। कुल मिलाकर यह शहर हमारे गांव की अम्मा थी। अम्मा क्या दादी अम्मा थी। हमारे गांव में कभी-कभी मेला लगता था। यहां तो रोज ही मेला लगता था। मॉल में मेला, सिनेमा हॉल में मेला, कालेज में मेला, स्कूल की छुट्टी हुई तो मेल, जहां देखिए लंबी कतार बैंक में, डॉक्टर के क्लीनिक, जेंट्स हो या लेडीज काफी भीड़ है शहर में। सड़क किनारे बड़ी-बड़ी बिल्डिंग, हर बिल्डिंग के आगे गाड़ी खड़ी हुई। जैसे- तैसे हमने एक कमरा किराए पर ढूंढ लिया। हां हम यहां राजा से प्रजा बन गए थे। हमारा रुतबा उस एक कमरे में सिमट गया था।
। हमें लगा अभी तक हम बेहोश थे, होश में तो हम अभी आए हैं। चलना तो हम बहुत पहले सिख गए थे, लेकिन जमीन पर पैर आज रखे हैं। एक छुट्टन ही था जो मेरी रुतबे को बनाए हुए था। दोनों समय का बर्तन साफ करना रात में पैर दबाना दौड़-दौड़ कर सारे काम करता था। बचपन से आदत थी थकता नहीं था। हम तीनों गांव से शहर आ गए। शहर की हवा हमें नहीं लगती ऐसा हो नहीं सकता था। कालेज के साथ-साथ कई काम एक साथ शुरू हो गए। देर रात सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना। मॉल में घूमना। दिन-दिन भर यहां वहां मटरगश्ती करना। होटल में खाना। इन सब में पैसे तो खर्च होने ही थे। जितने पैसे हमें घर से मिल रहे थे वह तो बस दो-चार दिन में ही खत्म हो जाते थे। हमें क्या पता था हमारा परिचय एक बार फिर से हकीकत जो होने वाला था। हम हर शनिवार शाम घर चले जाते थे। रविवार घर पर रहते थे, और सोमवार सुबह-सुबह शहर पहुंच जाते थे। हम शनिवार को गांव गए तो मां से और पैसों की मांग रख दी। मां की पुरानी आदत थी, पिताजी से मांग लो। मैंने मां की ओर देखा मां चावल से कंकड़ निकाल रही थी, चेहरे पर कोई भाव नहीं थे लेकिन जिसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी, वह हुआ बड़े भैया पीछे से आए और कुछ पैसे मेरे हाथों पर रखते हुए बोले यह लो यह पैसे, मैं बिल्कुल स्तब्ध था। क्योंकि आज तक बड़े भैया ने केवल मुझे डांट पिलाई थी। यह पहली बार था जब वह मेरी तरफ से खड़े थे। हम लोग गांव से शहर आ गए। यहां आने के बाद वह पैसे भी खर्च हो गए हमारे। हमने सभी के घरों के आगे गाड़ी खड़ी देख रखी थी, हमारे भी मन था कि हमारे पास एक बाइक हो। इस बार हम जब अपने घर गए, तो हमने अपने पिताजी से बाइक की मांग रख दी। पिता जी ने मुझे अपने पास बुलाया और अपने पास बैठा कर पिताजी ने कहा - देखो बेटा हमारे पास पैसे नहीं है, तुम्हारी तीन बहनों की शादी की हमने, जिससे काफी जमीन को गिरवी रख दिया है। हम तो केवल नाम के मुखिया जी रह गए हैं। हम सभी की उम्मीदें तुम ही पर टिकी है तुम शायद पढ़ लिखकर कुछ बन जाओ तो हमारा रुतबा वापस आ जाए। इतना सुन कर हम तो जैसे जमीन पर ही आ गिरे थे। लेकिन हमने भी धीरज नहीं खोया। हम सर झुकाये पिताजी की बाते सुनते रहे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद हमने कहा - पिताजी अगर हमें बाइक मिल जाएगी तो जो हम बस से आते जाते हैं और किराया देते हैं, उसकी बचत होगी। और हम वहां भी ऑटो रिक्शा से कोचिंग और कॉलेज जाते हैं उसका भी खर्चा बच जाएगा। ऐसा कह कर हमने पिताजी को मनाने की कोशिश की। पर पिताजी नहीं माने। उन्हें तो जैसे एक ही रट लगी हुई थी हमारे पास पैसा नहीं है। लेकिन हम भी हार मानने वाले नहीं थे। मुँह फुला कर गुस्से में घर से बाहर निकल गए। क्यों की हम घर में सबसे छोटे थे। जिस कारण हमारी सारी मांगे पूरी हो जाती थी।
लेकिन आज ऐसा नहीं था, मेरे बाहर निकलते ही पिता जी गुस्से से माँ से बोल रहे थे। हम बाहर खड़े हो कर पिता जी की बाते सुनने लगे। पिता जी माँ से बोल रहे थे – इस लड़के की फरमाइश तो बढ़ती ही जा रही। इसे शहर भेज कर हमने बहुत बड़ी गलती कर दी है। इसे तुम्हारे लाड दुलार ने बिगाड़ दिया है। पिता जी गुस्से में बोले जा रहे थे और माँ चुप चाप सुन रही थी। जब पिता जी गुस्से में रहते थे माँ चुप ही रहती थी। लेकिन तभी वहाँ बड़े भैया आ जाते हैं। ऐसे क्यों गुस्सा कर रहे है। थोड़े पैसो का इंतजाम कर एक मोटर साइकिल क्यों नहीं खरीद देते है। आज कल आसान किस्त पर भी गाड़ी मिल जाती है। थोड़ा -थोड़ा कर भर देंगे किस्त। ऐसे भी एक बाइक तो घर में होना ही चाहिए । पिताजी बोले ठीक है, मैं कुछ इंतजाम करता हूं। भईया ने बिच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी,और खेती में पिताजी के साथ हाथ बटाने लगे थे। पहले जब मैं किसी चीज के लिए ज़िद करता था भैया की डाट पड़ती थी। पूरे घर में यदि मुझे किसी से डर लगता था तो वो थे बड़े भईया ले। लेकिन आज सब उलटा हो रहा था। बड़े भैया ही मेरी तरफ से बोल रहे थे और पिता जी गुस्सा कर रहे थे ,मुझे इन सारी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था, मैंने बाइक के लिए पैसे लिए, और शहर चला गया, लेकिन वहां जाकर एक और नई मुसीबत खड़ी हो गई, बाइक आने से बाइक पानी से थोड़े चलती है, उसमें तेल भरवाना पड़ता है और तेल के लिए पैसे चाहिए थे, फिर क्या था हम तीनों ने जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया, मैंने श्रीधर से कहा- देख श्रीधर तू पंडित जी है, तेरा तो खानदानी बिजनेस है, ऐसा कर कि तू धोती कुर्ता पहन ले और एक टीका लगा ले और यहां आस-पास चार -पांच घर में पूजा कर आया कर, यह तो शहर है यहां तो गांव से ज्यादा ही पैसे मिलेंगे और हमारा काम भी चल जाएगा, इतना सुन कर श्रीधर जोर-जोर से हंसने लगा, और बोला मैंने आज तक कभी पूजा पाठ नहीं कराया है, पिताजी के साथ बैठता हूं जरूर पर ऐसी कोई बात मुझे आती नहीं है, फिर क्या था मैं और छुट्टन श्रीधर के पीछे ही पड़ गये, आखिर श्रीधर हार कर हमारी बात मानने के लिए तैयार हो गया, फिर क्या था छुट्टन बाज़ार से पूजा–पाठ वाली किताबे खरीद कर ले आया , सुबह सुबह उठकर नहा –धो कर श्रीधर ने धोती कुर्ता पहनकर माथे पर चंदन का टीका लगा कर तैयार हो गया, और चल दिए हम तीनो नदी किनारे, उस दिन पूर्णिमा के स्नान ध्यान का दिन था, शहर के लोग शहर में जरूर रहते थे परंतु पूजा-पाठ में विश्वास भी करते थे, इसलिए वहां काफी भीड़ थी, श्रीधर को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी, हम दोनों उसके पास ही बैठे थे दो चार लोग श्रीधर के पास आ गए, उन्होंने श्रीधर को पंडित जी कह कर संबोधित किया और श्रीधर के सामने कुछ पैसे और चावल दान दक्षिणा रख कर चले गए, छुट्टन और मेरी जैसे तो लॉटरी लग गयी ,उन पैसों से तो हमारा काम बन गया था, यह रोज का काम हो गया, श्रीधर पंडित जी के नाम से प्रसिद्ध होने लगा था, उसने कुछ किताबें भी खरीद ली थी पूजा-पाठ वाली, श्रीधर पढ़ाई में बहुत ही अच्छा था, परंतु हमें क्या पता था कि खेल खेल में शुरू हुआ यह पूजा-पाठ श्रीधर की किस्मत बन जाएगी, लेकिन श्रीधर के इस रूप का मेरे जीवन का एक इम्पोर्टेंट किस्सा और जुड़ा था,
लेखक का प्रेम पत्र -
भावना जी बहुत खुबसूरत थी, और जब उन्होंने हंस कर मेरी ओर एक नजर क्या देखा
मेरे दिल को तो जैसे पंख लग गए, नीले आसमान में ऐसे उड़ने लगा जैसे आवारा बादल,
क्लास रूम में सारा दिन नज़रे बचा कर तिरक्षी नजर से भावना जी को ही देखता रहता था,
भावना जी मुझे एक बार भी नज़रे उठा कर देख लेती तो ऐसा लगता मानों भरी दोपहर में
शाम हो गयी हो, बिन मौसम बरसात होने लगी, भावना जी खुबसूरत थी इसमें कोई शक नहीं
था, उनकी आँखे बड़ी-बड़ी, काले लम्बे बाल, होठ हल्के गुलाबी, दांत मोतियों जैसे,
भावना जी के आने से मुझे सारा कालेज ही खुबसूरत लगने लगा था, अचानक से सब बदल गया
था, पहले हमें शनिवार का इंतजार रहता था, सप्ताह के पांच दिन बहुत मुश्किल से कटते
थे, शहर हमें काटने को दौड़ता था, लेकिन आज सब बदल गया था, अभी रातें नहीं कटती,
सुबह का इन्तजार रहता है, भावना जी से हमारा आँखों वाला प्रेम एक साल चला, ये जो
आँखों वाला प्रेम है न ये धुप-छांव वाला प्रेम होता है, जिस दिन नजरों से नजरें
मिली उस दिन अमित जी गाना गुनगुनाते हम “देखा एक खवाब तो ये सिलसिले हुए, दूर तक
निगाहों में हैं गुल खिलें हुए “ लेकिन जिस उन्हें नहीं देखा तो कुछ सोचना तो दूर
मन ही नहीं लगता कहीं, आँखे केवल उन्हें ही खोजने में लगी रहती, लेकिन आँखों वाले प्रेम का
अपना मजा हैं, इस एक साल में छुट्टन की शादी हो गयी, छुट्टन केवल 17 साल का था,
ऐसे तो ये बाल विवाह था लेकिन इससे किसी को कोई एतराज नहीं था, छुट्टन को भी
नहीं, मैं और श्रीधर भी बारात गये थे,
एक दिन श्रीधर मुझसे बोला भावना जी से पूछ क्यों नहीं लेते, की उनके दिल में
क्या है,
मैं बोला कैसे पूंछू,
छुट्टन वहीँ था झट बोला- चिठ्ठी लिख दो भईया,
मै बोला हट बुड़बक चिठ्ठी लिखना मुझे नहीं आता,
छुट्टन फिर से बोला – मैं लिख देता हु न संजीव भईया, मैं और श्रीधर छुट्टन की
ओर देखने लगे,
छुट्टन – मुझे आता है चिठ्ठी लिखना ,सच्ची झुमकी ( झुमकी छुट्टन पत्नी का नाम
था ) को लिखता हु मैं चिठ्ठी, छुट्टन की इस मासूमियत पर मैं और श्रीधर जोर-जोर से
हंसने लगे,
[ऐसा नहीं है की मुझे लिखना नहीं आता हिंदी, इंग्लिश सब आती है, और सबसे
ज्यादा मैथ्स इसके लिए तो बहुत पिटाई खायी है बड़े भईया से, और इसका ईनाम भी मिला
है मुझे, छोटे से गांव के स्कूल से आया और शहर के इस भीड़ में एक छोटी सी पहचान मिली
इस मैथ्स की वजह से, मैथ्स का ऐसा कोई सवाल नहीं था जिसे मैं या श्रीधर बना नहीं
पाते, इस कारण क्लास के सारे लड़के-लड़कियों के साथ-साथ मास्टर जी भी हमें पहचाने लगे
थे, जब भी क्लास में कोई सवाल किसी से नहीं बनता, सर मुझसे बनवाते तब भावना जी का
प्यार से मेरी और देखना मेरे लिए सबसे बड़ा ईनाम था, खुद पर गर्व महसूस करता था
मैं,ये पागलपन का आलम था, लेकिन दिल की बात कागज पर उतरना भी एक कला है, नहीं तो
मैं भी लिख देता,” अपनी भावनाओं के भाव को कागज पर उतरना नहीं आता मुझे भावना “
लिखने को तो बहुत बाते लिख देता लेकिन उस वक्त ना तो मेरी समझदारी इतनी थी और न
उम्र, हमारे लिए तो उस वक्त सबसे बड़ी समस्या थी चिठ्ठी कैसे लिखू, और क्या लिखू,]
मुझे श्रीधर पर बहुत विश्वाश था, क्यों की श्रीधर भी आज कल बहुत सी
किताबे पढ़ने लगा था, कारण ओ पूजा पाठ जो कराने लगा था, और श्रीधर ने भी सहस्र
स्वीकार कर लिया चिठ्ठी लिखने के लिए, सुबह सो कर उठा तो श्रीधर ने एक कागज मेरे
हाथ में देते हुए कहा- ले पढ़ ले, और अच्छा लगे तो जा कर भावना जी को दे आ, मैं खुश होते
हुए पूछा तूने चिठ्ठी लिख दी ?
श्रीधर बोला – हाँ लेकिन एक बार पढ़ ले कैसा लिखा हूँ,
मैं ख़ुशी से बोला- अरे तूने लिखा है तो पक्का ठीक ही लिखा होगा, चल अब फटा-फट
दे आ भावना जी को,
श्रीधर हँसते हुए बोला- मैं नहीं इसे तू दे कर आएगा, पागल और तू उसे ये नहीं बतायेगा
की इसे मैंने लिखा है,
मैं हकलाते हुए बोला- मैं कैसे दूंगा,
तभी छुट्टन बोल- पड़ा, मैं दे आऊ,
श्रीधर छुट्टन को फटकार लगाते हुए बोला- चुप बुड़बक, सब गड़बड़ करेगा क्या
,चिठ्ठी तो संजीव ही देगा,
मैं सोच में पड़ गया, कुछ जुगाड़ लगाना पड़ेगा, यहीं सोच ही रहा था मैं, की सामने
से भावना जी आते हुए दिखायी दी, मैं सोचने लगा ये यहाँ क्यों आई है, तभी मुझे याद
आया उन्होंने मुझसे फिजिक्स का नोट्स माँगा था, मेरे दिमाग में एक उपाय सुझा मैंने
चिठ्ठी को उनके सामने ही नोट्स में रखा और उन्हें दे दिया,
मेरा दिल जोर –जोर से धड़क रहा था, पता नहीं क्या होगा, ओ क्या सोचेंगी मेरे बारे में, क्या जवाब होगा उनका, कही उन्होंने शिकायत कर दी तो या अपने घर में किसी को बता दिया तो, न जाने ऐसे कितने ही सवाल मेरे दिमाग में शोर मचा रहे थे, मुझे न भूख लग रही थी और ना प्यास, मैं रात भर सो नहीं सका, एक दिन गुजर गया ,दो दिन गुजर गया, भावना जी रोज कालेज आतीं थी, और मुसकुराते हुए चली जाती थीं, मैं उन्हें रोज इस उम्मींद से देखता था की आज मेरा जवाब आएगा, लेकिन नहीं आया, हाँ या ना कोई जवाब नहीं आया, इस तरह एक सप्ताह गुजर गया, आखिर में मेरा जवाब आया, भावना जी ने भी वही किया जो मैंने किया, फिजिक्स का नोट्स वापस करने आयीं, और मेरे सामने ही चिठ्ठी नोट्स में रख दिया, मेरे चिठ्ठी का जवाब मुझे मिल गया, चिठ्ठी पढ़ कर मेरे होश उड़ गये, पहले से ज्यादा परेशान हो गया मैं,
सामने से आ कर श्रीधर ने मुझसे पूछा –
भावना जी ने जवाब दिया ना तुझे, क्या कहा हां या ना, मुझे नहीं बताया तूने,
मैं उदास होते हुए कहा पता नहीं क्या लिखा हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आया, शायद किसी
और को चाहती है, ऐसा ही कुछ लिखा है,
ऐसा लिखा है भावना जी ने, श्रीधर बोला, किससे, क्या नाम है उसका, ला दिखा क्या
लिखा है चिठ्ठी में,
मैं चिठ्ठी देते हुए धीरे से कहा शायद किसी प्राणनाथ को चाहती हैं, श्रीधर
मेरे हाथ से चिठ्ठी लेते हुए मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं कोई जोकर हूँ,
पूरी चिठ्ठी पढ़ने के बाद श्रीधर बोला- इसमें भावना जी ने कहाँ लिखा है की वे
किसी और से प्रेम करती हैं, इसमें तो उन्होंने लिखा है की उन्हें ये प्रेम निवेदन
स्वीकार हैं,
मैं झुझलाते हुए बोला- इतना तो मुझे
भी समझ में आ रहा है लेकिन इसमें मेरा नाम कहा लिखा है,
श्रीधर गुस्से से बोला- तो इसमें किसी और का नाम कहाँ लिखा हैं बता जरा,
मेरे अंदर भी गुस्सा भरा हुआ था, मैं भी गुस्से से बोला- ये लिखा है ना
प्राणनाथ, पंडित टाइप का नाम,
ये सुनकर श्रीधर जोर-जोर से हंसने लगा, और बोला ये प्राणनाथ कोई नाम नहीं है
पागल, तुम्हें प्राणनाथ कह कर संबोधित किया है भावना जी ने,
मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता,
श्रीधर बोला- क्यों की मैंने भी ख़त में उन्हें प्राणप्रिय लिख कर संबोधित किया
था, इसलिए,
मैं बोला – तूने लिखा इसलिए जवाब भी तेरे लिए ही आया,
इस बार श्रीधर बिलकुल शांत था और बोला- लिखा मैंने, लेकिन दिया तो तुमने हैं ना, और ये चिठ्ठी देने वाले के लिए ही हैं, लिखने वाले के लिए नहीं,
मैंने कहा अच्छा ?
श्रीधर बड़े ध्यान से ख़त को पढ़ रहा था, और बोला- हाँ ये चिठ्ठी तेरे लिए ही है,
क्यों की इसमें तुम्हारा नाम लिखा हैं केवल तुम्हारा नाम, और कुछ नहीं,
मैं श्रीधर के हाथो से चिठ्ठी को लेकर देखने लगा, इसमें मेरा नाम कहाँ लिखा है, इस बार अपनी बेवकूफी पर मुझे भी हंसी आ गयी, उसमे सीधे-सीधे संजीव कहीं नहीं लिखा था भावना जी ने लेकिन केवल संजीव का अर्थ, पर्यावाची शब्द लिखे हुए थे, शायद इसीलिए मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की भावना जी ने ख़त में लिखा क्या है, अंत में एक पंक्ति लिखा था उन्होंने प्रेम से प्रेम का प्रेम निवेदन स्वीकार है मुझे, मैं भूल गया था की संजीव का एक अर्थ प्यार भी होता है, प्यार यानि प्रेम, छुट्टन वही बैठा था, वह हम दोनों की बाते चुप-चाप सुन रहा था,
एक गहरी साँस लेटे हुए छुट्टन बोल पड़ा- चलो ये प्रेम पत्र वाला मेटर साल्व हो गया नहीं तो इतिहास गवाह है भईया ये सुन्दरियों के चक्कर में ना, कई तख्तो-ताज फंना हो गये हैं, यहाँ भी हमारी दोस्ती दावं पर लग गयी थी,
मैं झेपते हुए छुट्टन से बोला- रुक बताता हूँ मैं तुझे,
मैं ,श्रीधर और छुट्टन तीनो हंसने लगे,
उस ख़त को आज भी सम्हाल कर रखा हैं मैंने,
मैं अल्पना सिंह श्रीधर पंडित का ये मैंने तीसरा भाग लिखा है, आप लोगो को मेरे श्रीधर पंडित कहानियों की श्रृंखला कैसी लगी कमेन्ट कर जरुर बताईए, और आगे की कहानी के लिए मेरे ब्लॉग से जुड़े रहिये www.my storiess.com से
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It's great to see the next chapter.keep it up
ReplyDeleteLove your stories 😍😍
Very nice story
ReplyDeletevery nice story
ReplyDeleteVery interesting and mind-blowing.. Waiting for next part. Can please upload in English also because many of my friends is requesting.
ReplyDeleteNice story
ReplyDeleteNice story ☺️
ReplyDeleteJi bahut bahut aabhar apka
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