"होली के रंग और रिश्तों की मर्यादा"

 


"होली के रंग और रिश्तों की मर्यादा"         

रिमा की शादी तरुण से हुई थी, और यह उसकी ससुराल में पहली होली थी। पूरे घर में उत्सव का माहौल था। हर कोई इस त्योहार को हर्षोल्लास से मनाने के लिए तैयार था। रंग, पिचकारी और नए कपड़े खरीदे जा रहे थे। रिमा भी इस खुशी में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थी।

तरुण के बड़े भाई बिनय, जो दूसरे शहर में काम करते थे, वे भी होली मनाने के लिए घर आए हुए थे। साथ ही, घर की लाडली बेटी और रिमा की ननद नीता भी अपने परिवार के साथ आने वाली थी। पूरे घर में उनके स्वागत की तैयारियाँ चल रही थीं। सब कुछ खुशी और उल्लास से भरा था, लेकिन रिमा ने गौर किया कि उसकी जेठानी ममता भाभी अचानक उदास हो गई थीं। जब रिमा ने उनसे पूछा, तो उन्होंने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया।

एक कड़वी याद

दोपहर में जब नीता दीदी, जीजाजी और उनके बच्चे घर पहुँचे, तो खुशियों का माहौल और भी रंगीन हो गया। लेकिन ममता भाभी अब भी अनमनी लग रही थीं। रात के समय जब सब लोग हॉल में बैठकर बातें कर रहे थे, तब रिमा रसोई में काम निपटा रही थी। तभी ममता भाभी चुपचाप उसके पास आ खड़ी हुईं।

रिमा ने मुस्कुराकर कहा, "भाभी, आपकी तबीयत ठीक नहीं है, तो आप आराम कीजिए, मैं सारा काम कर लूँगी।"

ममता भाभी ने धीमे स्वर में कहा, "रिमा, मुझे तुझसे एक बात कहनी थी।"

रिमा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा, "बताइए, भाभी?"

ममता भाभी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "ये जीजाजी होली में बौरा जाते हैं…"

रिमा चौंक गई, "मतलब?"

ममता भाभी की आँखों में दर्द उभर आया, "जब मेरी भी पहली होली थी, तो मैं भी बहुत उत्साहित थी, लेकिन…" उन्होंने एक पल के लिए खुद को संभाला और आगे कहा, "होली के दिन जीजाजी ने रंग लगाने के बहाने मुझे इधर-उधर छूना शुरू कर दिया। जब मैंने विरोध किया, तो घर में हंगामा हो गया। नीता दीदी रोने लगीं, माँ जी अलग परेशान हो गईं, और बिनय चुपचाप खड़े रहे। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अगर दूसरों का छूना पसंद नहीं, तो होली खेलती ही क्यों हो? उसी दिन से मैंने होली खेलना बंद कर दिया।"

रिमा यह सुनकर सन्न रह गई। वह रातभर सो नहीं पाई।

होली का दिन

सुबह से ही होली का शोर शुरू हो गया था। रिमा किचन के काम में लगी थी, लेकिन उसका मन अस्थिर था। तभी सासु माँ ने आकर कहा, "बेटा, जीजाजी तुम्हें रंग लगाना चाहते हैं, जाकर रंग लगवा लो।"

रिमा का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और खुद को पूरी तरह ढक लिया। फिर वह धीरे-धीरे जीजाजी के सामने जा खड़ी हुई।

जीजाजी ने पहले उसके गालों पर हल्का सा गुलाल लगाया। रिमा हल्की मुस्कान लिए खड़ी रही। फिर उन्होंने अचानक उसकी गर्दन पर जोर से रंग मला। अब रिमा सतर्क हो गई थी। जैसे ही उनका हाथ आगे बढ़ा, रिमा ने झट से उनका हाथ पकड़ लिया और जोर का धक्का देकर खुद से अलग कर दिया। इसके बाद उसने अपनी मुट्ठी में भरा गुलाल जीजाजी के पूरे चेहरे पर मल दिया।

जीजाजी हड़बड़ा गए। उन्हें रिमा से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, तरुण ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया। इसी बीच, ममता भाभी ने भी पास रखी रंगों की बाल्टी उठाई और जीजाजी पर उड़ेल दी।

बेचारे जीजाजी इस सबके लिए बिलकुल तैयार नहीं थे। पूरा घर हँसी और ठहाकों से गूँज उठा।

होली की सच्ची सीख

शाम को होली मिलन समारोह में, रिमा ने धीरे से मुस्कुराते हुए जीजाजी के गालों पर गुलाल लगाते हुए कहा,

"जीजाजी, होली में होली की गरिमा और रिश्तों की मर्यादा बनी रहे, ऐसी होली खेलनी चाहिए। होली केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक है। हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि होली की गरिमा बनी रहे।"

सभी ने तालियों से रिमा के इस विचार का स्वागत किया। ममता भाभी की आँखों में भी एक नई चमक थी। इस बार होली के रंगों में मर्यादा और सम्मान का एक नया रंग भी घुल गया था।

हैप्पी होली!

लेखिका-अल्पना सिंह  

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